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जब एक खिड़की खुलती है

Mon, 21 Apr 2014 08:02 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 21 Apr 2014 08:02 PM IST
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हरियाणा की सतरोल खाप पंचायत ने दूसरी जातियों और बयालीस गांवों तक फैली अपनी सीमा में शादी न करने की करीब सात सौ साल पुरानी प्रथा को खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला लेकर अपनी आधुनिक सोच का ही परिचय दिया है। इस फैसले के बाद अब इस खाप से जुड़े लोग आसपास के गांवों में अपने बच्चों की शादी कर पाएंगे, और अभिभावकों की सहमति पर अंतर्जातीय विवाह भी संभव हो सकेगा।

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जो जमीन हाल के दशकों तक प्रेमियों का कत्ल कर देने के लिए कुख्यात थी, अब वहां बदलाव की यह शुरुआत उम्मीद जगाने वाली तो है ही, निकट भविष्य में यह दूसरी खापों को ऐसा ही कदम उठाने के लिए प्रेरित करे, तो बिल्कुल आश्चर्य नहीं होगा। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ, जब कंडेला की महापंचायत ने कन्या भ्रूणहत्या और दहेज प्रथा के खिलाफ दिशानिर्देश जारी किया था।
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इस तरह के प्रगतिशील फैसले बताते हैं कि खाप खुद को समय के अनुरूप ढाल रही है। पहले भी इन्होंने समय के अनुरूप अपने नियम बदले हैं। सतरोल की खाप पंचायत ने जो यह फैसला लिया, उसकी एक बड़ी वजह तो व्यावहारिक है; विवाह के मामले में नानाविध विधि-निषेध मानने वाले समाज में लड़कों की शादी मुश्किल होती जा रही है। शिक्षा और रोजगार के कारण यहां के युवा जिन इलाकों में जाते हैं, वहां विवाहों के नियम इतने कठोर नहीं हैं। शिक्षा और आधुनिक सोच से लैस यह युवा वर्ग न तो सामाजिक मान्यताओं को पहले की तरह स्वीकार करने की मानसिकता रखता है, और न ही बदलाव की इस हवा को रोक पाना पहले की तरह संभव है।
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इसके अलावा इसी पुरुषवर्चस्ववादी समाज में अब पढ़ी-लिखी, जागरूक महिलाओं की प्रभावी मौजूदगी दिखने लगी है, जो औरतों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव चाहती हैं। महिलाओं के हित में भीतर से उठती आवाजों को अब पहले की तरह दबाया नहीं जा सकता। इस बदलती मानसिकता के पीछे लड़कियों को शक्तिशाली बनाने की सरकारी योजनाओं का भी निश्चय ही योगदान है। इन सबका सुफल कई जगह लड़कियों के सुधरते अनुपात में भी देखा जा सकता है और उनके प्रति समाज के बदलते नजरिये में भी। परंपराओं से बंधे समाज में खिड़कियों का खुलना तो उल्लेखनीय है ही, इन्हें रेखांकित करना भी उतना ही जरूरी है।

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