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लोकपाल में नया क्या

Fri, 01 Feb 2013 12:22 AM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 01 Feb 2013 12:22 AM IST
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whats new in lokpal

लोकपाल विधेयक से संबंधित राज्यसभा की प्रवर समिति के ज्यादातर सुझावों को मंजूरी देकर सरकार ने पहले की तुलना में थोड़े लचीलेपन का परिचय अवश्य दिया है, लेकिन एक मजबूत लोकपाल के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। हां, लोकसभा में लोकपाल विधेयक पारित करते हुए सरकार ने जिस जल्दबाजी और आधी-अधूरी प्रतिबद्धता का परिचय दिया था, उसकी तुलना में सरकार का मौजूदा रुख थोड़ा परिपक्व जरूर है।

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केंद्र के लचीलेपन का एक बड़ा उदाहरण यही है कि लोकायुक्त के गठन की जिम्मेदारी उसने राज्य सरकारों पर ही छोड़ दी है, लेकिन लोकपाल के गठित होने के एक साल के भीतर राज्य सरकारों को अपने यहां लोकायुक्त की नियुक्ति करनी होगी। अलबत्ता सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाने के बारे में सरकार की सहमति को उसकी संपूर्णता में देखना होगा।
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यह तो ठीक है कि प्रवर समिति के सुझाव को स्वीकारते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने सीबीआई को लोकपाल के दायरे में रखने की बात मानी है। अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए आंदोलन की प्रमुख मांग ही यह थी कि सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल के दायरे में लाया जाए।
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लेकिन सीबीआई अधिकारियों के स्थानांतरण और दूसरी गतिविधियों में लोकपाल के बजाय सीबीआई मुखिया और सरकार के नियंत्रण का प्रावधान बताता है कि सीबीआई को लोकपाल के अधीन लाने का फैसला प्रतीकात्मक ही ज्यादा है।

इसी तरह केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ लोकपाल के तहत जांच होने की स्थिति में उन्हें सफाई देने का अवसर प्रदान करने का कैबिनेट का रुख और चाहे कुछ हो, लेकिन यह भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती का सुबूत तो नहीं ही है। राजनीतिक दलों और वित्तपोषित गैरसरकारी संगठनों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखकर सरकार क्या संकेत देना चाहती है! ऐसे में अन्ना हजारे ने इसे अगर प्रहसन बताया है, तो समझा जा सकता है।


दिक्कत यही नहीं है कि सरकार, विपक्ष और सिविल सोसाइटी-यानी तीन हिस्सों में विभाजित होने के कारण इस मुद्दे पर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं, समस्या यह भी कि भाजपा समेत दूसरे विपक्षी दलों के रुख को देखते हुए लोकपाल की आगे की राह पहले की तरह ही कठिन है।

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