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लौटी भारत की बेटी

नई दिल्ली Updated Mon, 26 Oct 2015 08:42 PM IST
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रास्ता भटककर पाकिस्तान जा पहुंची भारत की बेटी गीता की करीब डेढ़ दशक बाद वतन वापसी खुद उसके लिए तो सुखद है ही, इस घटनाक्रम ने गलती से दोनों ओर की सरहद लांघ चुके ऐसे दूसरे बच्चों में भी वतन वापसी की संभावनाएं जगा दी हैं। सरहद पार तक सिर्फ पंछी, नदिया और पवन के झोंकों की ही बेरोकटोक आवाजाही नहीं होती, भोले बच्चे भी दो देशों के बीच खींची गई सरहदों की परवाह नहीं करते।
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करीब डेढ़ दशक पहले समझौता एक्सप्रेस से जो लड़की बेहद दयनीय स्थिति में लाहौर पहुंची थी, वह अपनी आंखों में सुनहरे सपने लिए पाकिस्तान एयरलाइंस के विमान से हंसती-मुस्कराती भारत लौटी है, तो इसके लिए हमें इस्लामाबाद का शुक्रिया अदा करना चाहिए। पाकिस्तान के एक एनजीओ ईदी फाउंडेशन ने इतने वर्षों तक न केवल उसे अपनी बेटी की तरह रखा, बल्कि उसे नाम भी दिया। यह मालूम होने पर, कि वह हिंदू है, उसे पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता भी दी गई! इस लिहाज से वह भारत की नहीं, पाकिस्तान की भी बेटी है। धार्मिक असहिष्णुता के इस दौर में गीता की यह कहानी सीमा के दोनों तरफ रहने वाले नफरत के सौदागरों के लिए सबक है। अलबत्ता गीता का वतन लौटना सीमा के दोनों ओर आम लोगों के बीच बेहतर रिश्ते का सुखद पूर्णविराम नहीं होना चाहिए।


गीता भाग्यशाली है कि उसकी वतन वापसी दोनों तरफ की सरकारों की पहल और मीडिया की चकाचौंध के बीच हुई है। उम्मीद करनी चाहिए कि जल्दी ही वह अपने परिवार से मिलकर नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर पाएगी। लेकिन गलती से सरहद पार कर जाने वाले सभी बच्चे गीता की तरह भाग्यशाली नहीं होते। वे गलती से, गुस्से में घर छोड़ते हैं, और जब उन्हें एहसास होता है कि वे अपने देश की सीमा लांघ आए हैं, तब तक वापसी के तमाम रास्ते बंद हो चुके होते हैं।

इसलिए यह अवसर सीमा के दोनों ओर भटककर पहुंच गए बच्चों की शिनाख्त और उनकी वतन वापसी के लिए प्रभावी पहल का भी होना चाहिए। पाकिस्तान से सिर्फ गीता नहीं लौटी है, उसके साथ-साथ दोतरफा रिश्तों के बेहतर होने की झीनी उम्मीद भी लौटी है। अगर दोनों देशों के नागरिकों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता कायम करना है, तो इस उम्मीद को टूटने नहीं देना चाहिए।
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