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हम सब एक हैं
अमर उजाला नई दिल्ली
Updated Wed, 19 Mar 2014 07:40 PM IST
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भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की राजनीति में एकरूपता के साझा सूत्र भले ही न मिलें, पर चुनाव से पहले टिकट को लेकर इनमें जो अंदरूनी माहौल दिखाई देता है, वह कमोबेश समान है और राजनीतिक अवसरवाद को ही प्रमाणित करता है।
टिकट को लेकर सबसे अधिक मारामारी भाजपा में है। चूंकि भाजपा की लहर बताई जा रही है, ऐसे में पार्टी का हर नेता इसका लाभ उठा लेना चाहता है। सर्वाधिक लोकसभा सीट वाले उत्तर प्रदेश पर मुख्य रूप से फोकस करते हुए पार्टी ने कई मौजूदा सांसदों को विस्थापित किया है, लिहाजा सर्वाधिक क्षोभ भी यहीं दिखता है।
मुरली मनोहर जोशी और लालजी टंडन अगर शुरू में मुखर थे, तो अब जनरल वी के सिंह, उदित राज, मनोज तिवारी, जगदंबिका पाल जैसे 'नवोदितों' को टिकट देने से लोगों का गुस्सा स्थानीय बनाम बाहरी के नारे से मुखर हो रहा है। चंडीगढ़ में किरण खेर को प्रत्याशी बनाए जाने का ऐसा विरोध हुआ कि पर्चा भरने के लिए जाते हुए उन्हें काले झंडे दिखाए गए।
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लालकृष्ण आडवाणी की सीट को लेकर जो असमंजस दिख रहा है, वह तो पार्टी में शीर्ष स्तर पर मतभेद का संकेत देता है। कांग्रेस की स्थिति इससे उल्टी है। तमिलनाडु में चुनावी गठजोड़ न होने से वह हताश है, तो तेलंगाना के उसके फैसले से सीमांध्र में बड़ी संख्या में कांग्रेस पार्टी छोड़ गए हैं।
उत्तर भारत में भी उसकी स्थिति ठीक नहीं। पी चिंदबरम और मनीष तिवारी जैसे कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव न लड़ने की इच्छा जताई है, तो इसके पीछे पार्टी की घटती लोकप्रियता भी एक वजह है, जबकि हाईकमान इन सबको चुनाव लड़वाने के पक्ष में है। आम आदमी पार्टी भी कुछ अलग नहीं।
चाहे प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड की बात सच हो या उन प्रत्याशियों के जवाबी आरोप, इनसे पार्टी की अच्छी छवि नहीं बनती। आप का सदस्य बनने या टिकट हासिल करने में अब पहले जैसी व्यग्रता नहीं है, तो वह इसलिए कि बहुतेरे लोगों को शायद लगता है कि यह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा शायद न पूरी कर पाए।
पर प्रत्याशी खड़े करते हुए आप भी अगर जाति, वर्ग और दूसरे समीकरणों को महत्व देती है और पहले की घोषणा के विपरीत जाकर विधायकों को लोकसभा का टिकट दे रही है, तो फिर वह दूसरों से अलग कहां है!
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टिकट को लेकर सबसे अधिक मारामारी भाजपा में है। चूंकि भाजपा की लहर बताई जा रही है, ऐसे में पार्टी का हर नेता इसका लाभ उठा लेना चाहता है। सर्वाधिक लोकसभा सीट वाले उत्तर प्रदेश पर मुख्य रूप से फोकस करते हुए पार्टी ने कई मौजूदा सांसदों को विस्थापित किया है, लिहाजा सर्वाधिक क्षोभ भी यहीं दिखता है।
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मुरली मनोहर जोशी और लालजी टंडन अगर शुरू में मुखर थे, तो अब जनरल वी के सिंह, उदित राज, मनोज तिवारी, जगदंबिका पाल जैसे 'नवोदितों' को टिकट देने से लोगों का गुस्सा स्थानीय बनाम बाहरी के नारे से मुखर हो रहा है। चंडीगढ़ में किरण खेर को प्रत्याशी बनाए जाने का ऐसा विरोध हुआ कि पर्चा भरने के लिए जाते हुए उन्हें काले झंडे दिखाए गए।
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लालकृष्ण आडवाणी की सीट को लेकर जो असमंजस दिख रहा है, वह तो पार्टी में शीर्ष स्तर पर मतभेद का संकेत देता है। कांग्रेस की स्थिति इससे उल्टी है। तमिलनाडु में चुनावी गठजोड़ न होने से वह हताश है, तो तेलंगाना के उसके फैसले से सीमांध्र में बड़ी संख्या में कांग्रेस पार्टी छोड़ गए हैं।
उत्तर भारत में भी उसकी स्थिति ठीक नहीं। पी चिंदबरम और मनीष तिवारी जैसे कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव न लड़ने की इच्छा जताई है, तो इसके पीछे पार्टी की घटती लोकप्रियता भी एक वजह है, जबकि हाईकमान इन सबको चुनाव लड़वाने के पक्ष में है। आम आदमी पार्टी भी कुछ अलग नहीं।
चाहे प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड की बात सच हो या उन प्रत्याशियों के जवाबी आरोप, इनसे पार्टी की अच्छी छवि नहीं बनती। आप का सदस्य बनने या टिकट हासिल करने में अब पहले जैसी व्यग्रता नहीं है, तो वह इसलिए कि बहुतेरे लोगों को शायद लगता है कि यह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा शायद न पूरी कर पाए।
पर प्रत्याशी खड़े करते हुए आप भी अगर जाति, वर्ग और दूसरे समीकरणों को महत्व देती है और पहले की घोषणा के विपरीत जाकर विधायकों को लोकसभा का टिकट दे रही है, तो फिर वह दूसरों से अलग कहां है!