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राज्यसभा का रास्ता

Thu, 30 Jan 2014 07:55 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 30 Jan 2014 07:55 PM IST
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way to rajya sabha

अब कोई इस पर ध्यान भी नहीं देता कि उच्च सदन का गठन राज्यों से विशिष्ट गैर राजनीतिक लोगों को संसद में लाने के लिए किया गया था। राज्यसभा के लिए उसी राज्य से होने की अनिवार्यता का उल्लंघन भी आम है।

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उच्च सदन वस्तुतः उन राजनेताओं के लिए संसद में आने का ठिकाना हो गया है, जो चुनाव नहीं लड़ते या चुनाव हार चुके हैं। उच्च सदन में थैलीशाहों का आना तो अब आम है ही, जैसे भाजपा बिहार से रवींद्र किशोर सिन्हा को ला रही है, राज्यसभा में लाने के पीछे किसी की ताकत कम करने, किसी दूसरे को औकात बताने और कई बार सहयोगियों के साथ चुनावी समीकरण बिठाने का तर्क भी काम करता है।
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सुल्तानपुर से सांसद संजय सिंह को असम से राज्यसभा का टिकट देने का फैसला कांग्रेस को अचानक इसलिए लेना पड़ा है कि लगभग बागी बन चुका यह नेता अमेठी में राहुल गांधी का खेल न खराब कर दे। दिल्ली में चेहरा बदलने से बौखलाए विजय गोयल को राजस्थान से राज्यसभा में लाने के भाजपा के फैसले के पीछे भी यही तर्क है। कुमारी सैलजा को उच्च सदन में लाने को उनके विरोधी भूपिंदर सिंह हुड्डा को आईना दिखाने की कवायद माना जा रहा है।
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बताया तो यह भी जा रहा है कि सोनिया गांधी के बीमार पड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाने का यह पुरस्कार उन्हें पार्टी ने प्रमोशन के तौर पर दिया है! दिग्विजय सिंह और मधुसूदन मिस्त्री को राज्यसभा में लाने के पीछे कांग्रेस चाहे चुनाव से पहले पार्टी को मजबूत करने का तर्क दे, लेकिन संदेश यही जाता है कि ये नेता चुनाव नहीं लड़ना चाहते। कई बार इस तरह की उखाड़-पछाड़ पर नेताओं की नाराजगी छिपती भी नहीं, जैसे लोकसभा चुनाव लड़ने के फरमान पर जदयू नेता शिवानंद तिवारी का गुस्सा है।


ऐसे ही सहयोगी पार्टी को खुश करने के लिए झामुमो ने जहां दिवंगत सुधीर महतो की पत्नी को राज्यसभा का टिकट न देकर पार्टीजनों की नाराजगी मोल ली है, वहीं महाराष्ट्र में भाजपा को प्रकाश जावड़ेकर का टिकट रामदास अठावले को देना पड़ा है। राज्यसभा के चुनाव का हर अवसर अब लेन-देन का ऐसा अवसर बनता नजर आता है, लेकिन जिस सरकार का मुखिया ही राज्यसभा से चुना गया हो, वहां उच्च सदन की गरिमा बहाल करने की उम्मीद भला कोई किससे करे!

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