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धुलता हुआ मानसून सत्र
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 31 Jul 2015 08:07 PM IST
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छोटे-से मानसून सत्र की आधी अवधि बगैर किसी विधेयक पर बहस के बीत चुकी है। सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के जो तेवर हैं, उन्हें देखते हुए सत्र की बची हुई अवधि में हमारे जनप्रतिनिधि जरूरी गंभीरता का परिचय देंगे या नहीं, कह नहीं सकते। इस सत्र में भूमि अधिग्रहण समेत रियल एस्टेट बिल तथा जीएसटी सहित कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी थी। गतिरोध की इस स्थिति में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के भविष्य पर चिंतित होना स्वाभाविक है, जिस पर पहले से ही कई विपक्षी दलों की आपत्तियां हैं।
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अगर बहस होती, तो उस पर पड़ी धुंध कुछ तो छंटती, पर अब तो उसकी भी उम्मीद कम ही दिखाई दे रही है। आंकड़ों की जुबानी कहें, तो अब तक 91 फीसदी वक्त बर्बाद हो चुका है, जिससे 260 करोड़ रुपये की चपत लगी है। केंद्रीय मंत्री-मुख्यमंत्रियों के इस्तीफों के बगैर विपक्ष, खासकर कांग्रेस, संसद में कामकाज शुरू होने देने के पक्ष में नहीं है, इसका सुबूत सत्र की शुरुआत में ही तब दिखा था, जब सुषमा स्वराज के मुद्दे पर सत्ता पक्ष द्वारा बहस के लिए तैयार होने के बावजूद उसने हंगामे का रास्ता चुना। लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सदन में नारे लिखी तख्तियां लहराए जाने को गंभीरता से लिया है, इसके बावजूद कांग्रेसी सांसद अधीर रंजन चौधरी का उन्हीं की टेबिल पर ऐसी तख्ती रखकर विरोध जताना क्या बताता है?
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हद तो यह है कि इसके बाद भी विपक्ष संसद चलाने की जवाबदेही सत्ता पक्ष पर डालकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है। चूक सत्ता पक्ष की तरफ से भी हो रही है। लोकसभा में वह संख्याबल में मजबूत है, इसके बावजूद सबसे ज्यादा नुकसान लोकसभा की कार्यवाही ठप होने से ही हो रहा है। सत्र की शुरुआत में संसद की कार्यवाही ठप कर देने की इच्छा रखने वाले विपक्षी दल कम ही थे, लेकिन अब सदन में विरोध की आवाजें तेज भी हैं और संगठित भी। साफ है कि शुरुआत में ही बिखरे हुए विपक्ष का राजनीतिक लाभ उठाने में, जिसमें संसदीय कार्य मंत्री की महत्वपू्र्ण भूमिका होती है, सत्ता पक्ष विफल रहा है। मगर अब भी देर नहीं हुई है; बचे हुए वक्त में सत्ता पक्ष और विपक्ष विधायी कार्यों के प्रति गंभीरता दिखाकर अपनी छवि सुधार सकते हैं।
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