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महाराष्ट्र के चुनावी समर में
नई दिल्ली
Updated Mon, 06 Oct 2014 08:47 PM IST
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महाराष्ट्र में दो गठबंधनों की टूट ने वहां की राजनीति को जिस तरह उलट-पलट दिया है, उसका असर वाकई देखने लायक है। मसलन, वहां की चुनावी राजनीति में जाति, समाज, मजहब और क्षेत्रीयता के आधार पर हो रही धड़ेबंदी चौंकाती है। अब तक हाशिये पर रह रहे उत्तर भारतीय अचानक इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि मनसे को इस बार एक उत्तर भारतीय को टिकट देना पड़ा है! इसी तरह अब तक नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले राज ठाकरे अब उन्हें विभाजनकारी राजनीति के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
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हालांकि चुनाव मैदान में तो शिवसेना, भाजपा और एनसीपी का ही दबदबा दिखता है, जिनमें से उद्धव ठाकरे मराठी एकता के पैरोकार के नाम पर वोट मांग रहे हैं, नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र के विकास के लिए बहुमत चाह रहे हैं, जबकि शरद पवार के पास मराठी अस्मिता के अलावा भुनाने को बहुत कुछ है नहीं। शिवसेना भाजपा से भी ज्यादा मोदी पर हमलावर है, जिसमें मनसे भी उसके साथ दिखती है।
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यह अचानक नहीं है कि पहले राज ठाकरे ने गुजरात की मुख्यमंत्री द्वारा मराठी उद्योगपतियों से गुजरात में निवेश करने के लिए कहने पर ऐतराज जताया, फिर शिवसेना ने भी सामना में यह मुद्दा उठाया। ऐसे में, बिल्कुल हो सकता है कि यह चुनाव दोनों ठाकरे को एक कर दे और मराठी अस्मिता के नाम पर एनसीपी भी उनके साथ हो जाए। जहां तक भाजपा का सवाल है, तो आंकड़ों के लिहाज से वह सबसे मजबूत स्थिति में है। लोकसभा चुनाव में वहां उसका वोट प्रतिशत सर्वाधिक था। पर राज्य में मुख्यमंत्री पद का उसका कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं। तिस पर विधानसभा के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री की इतनी सक्रियता हैरान करती है। तब तो और, जब हालिया उपचुनाव भाजपा के लिए हताशाजनक रहे हैं।
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महाराष्ट्र के बहुकोणीय मुकाबले में उसका प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा, तो मोदी की छवि पर असर पड़ेगा। शिवसेना पर हमला न करना बेशक उसकी बेहतर रणनीति का परिचायक है, पर शरद पवार पर उसका हमलावर होना आश्चर्यजनक है। क्या वह आत्मविश्वास से इतनी भरपूर है कि छोटे दलों के सहारे ही सरकार बना लेने की उम्मीद कर रही है या शिवसेना के साथ गठजोड़ का उसे अब भी भरोसा है? जो भी हो, वहां चुनाव के बाद की परिस्थितियां मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को और उलट-पलट सकती हैं।