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लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई

Tue, 14 Jan 2014 07:43 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 14 Jan 2014 07:43 PM IST
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war for polio free nation is going on

पांच साल पहले तक जिस देश में पोलियो के मामले चौंकाने वाले होते थे, आज वह पोलियो मुक्त देश बन चुका है, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में आजाद भारत की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। बीती सदी के आठवें दशक में टीकाकरण अभियान के जरिये इसी तरह चेचक को खत्म किया गया था।

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वर्ष 1988 में पोलियो के खिलाफ वैश्विक लड़ाई जब शुरू हुई, तब भारत पोलियो उन्मूलन के लिए सबसे चुनौती भरे देशों में से था। भीषण गरीबी, सघन आबादी, साफ-सफाई की कमी, लगातार विस्थापन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की लाचारी के कारण पोलियो पर लगाम लगाना आसान नहीं था, जो दूषित पेयजल के सेवन से पांच साल तक बच्चों को धर दबोचता है। बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति तो सबसे खराब थी।
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इसके बावजूद सरकारों की इच्छाशक्ति, चिकित्सा तकनीक में आए क्रांतिकारी बदलाव, कॉरपोरेट कंपनियों सहित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, सीडीसी और रोटरी इंटरनेशनल के तालमेल के कारण इस लड़ाई के सकारात्मक नतीजे दिखने लगे थे। इस अभियान में बीस लाख से भी अधिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों का योगदान तो सर्वाधिक याद रखने योग्य है, जो हर निश्चित तारीख को घर-घर जाकर पांच वर्ष तक के करोड़ों बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाते थे।
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जागरूकता और प्रचार ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। मसलन, अमिताभ बच्चन जैसी शख्सियत को इस अभियान की ब्रांडिंग के लिए चुना गया, तो उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में जब मुस्लिम समुदाय ने अफवाहों के आधार पर पोलियो उन्मूलन अभियान में बाधा पहुंचाई, तो रोटरी इंटरनेशनल ने उलेमा समिति के जरिये लोगों को जागरूक करना शुरू किया।


लेकिन खुशफहमी से अभी एक तो इसलिए बचना चाहिए कि चीन, सीरिया और ताजिकिस्तान को पोलियो मुक्त घोषित करने के कुछ वर्षों बाद वहां इसके वायरस सक्रिय पाए गए। दूसरे, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से पोलियो वायरस के यहां पहुंचने की आशंका लगातार बनी रहेगी, लिहाजा इस मामले में सक्रियता जारी रखनी होगी। यह भी कोशिश तो होनी चाहिए कि दूसरी कई बीमारियों, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिमागी बुखार को निर्मूल करने के लिए इसी तरह का अभियान चलाया जाए।

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