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जमीन की जंग

Sun, 19 Apr 2015 08:09 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 19 Apr 2015 08:09 PM IST
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War for land

रामलीला मैदान में आत्मविश्वास भरी छवि और सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाकर राहुल गांधी ने जहां अपनी अनुपस्थिति के मुद्दे को नेपथ्य में कर दिया है, वहीं किसान और खेत मजदूर रैली के जरिये कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष का संदेश देने में कमोबेश कामयाब हुई है।

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बेशक प्राकृतिक दुर्योगों के कारण पहले भी फसल बर्बाद हुई है, और इससे पूर्व भी बेबस किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। बल्कि किसानों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, तो इसके लिए केंद्र की सत्ता में अधिक समय तक रहने वाली कांग्रेस ही सर्वाधिक जिम्मेदार है। इसके बावजूद संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, किसानों की आत्महत्याओं और फसलों की खरीद के मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेरने की जो कोशिश कांग्रेस ने की, उसका अब तक अभाव ही दिखा था। नई अर्थनीति कांग्रेस की देन है, और उसके प्रणेता मनमोहन सिंह भी मंच पर थे, फिर भी मोदी सरकार को किसान-विरोधी और उद्योगपतियों की हितैषी बताने के अपने मकसद में कांग्रेस सफल हुई है।
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इसी कारण प्रधानमंत्री और दूसरे भाजपा नेताओं को जोर देकर यह कहना पड़ा है कि उनकी सरकार उद्योगपतियों की मददगार नहीं है। हालांकि लगातार पराजयों से खुद कांग्रेस हताशा और नेतृत्व के मसले पर आंतरिक मतभेद की जिस स्थिति से दो-चार है, उसमें एक रैली से उसे बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इसके अलावा राहुल गांधी की अब तक की राजनीति भी बहुत आश्वस्त नहीं करती। जब फसलें बर्बाद हो रही थीं, तब वह किसानों के आंसू पोछने के बजाय छुट्टी पर थे, और उनकी वापसी के बाद जब उनकी पार्टी ने इस रैली का आयोजन किया, तब फसलों की कटाई का समय है।
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सरकार ने बजट सत्र के दूसरे हिस्से के पहले ही दिन संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लोकसभा में पेश करने का इरादा जताकर साफ कर दिया है कि जमीन की लड़ाई में वह पीछे हटने वाली नहीं है। राहुल गांधी की आक्रामकता से मोदी सरकार की सेहत पर बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला, पर हमलावर होती कांग्रेस, एकजुट जनता परिवार और माकपा में नेतृत्व परिवर्तन से विपक्ष की एकता का जो संदेश मिल रहा है, उसे राज्यसभा में अल्पमत वाली मोदी सरकार को हल्के में भी नहीं लेना चाहिए।

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