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हिंसा-प्रतिहिंसा की राजनीति

Thu, 06 Mar 2014 08:08 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 06 Mar 2014 08:08 PM IST
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Violence -  grievance politics

जिस दिन लोकसभा चुनाव की घोषणा होने के साथ आदर्श आचार संहिता लागू हो गई, उसी दिन अरविंद केजरीवाल को हिरासत में लेने के मुद्दे पर भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच हुई भिड़ंत दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, चुनाव से पहले इस तरह की हिंसा कई आशंकाओं को जन्म देती है।

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हालांकि गुजरात में केजरीवाल के काफिले को जिस तरह रोका गया, उन्हें काले झंडे दिखाए गए, और देर शाम उनकी कार को निशाना बनाया गया, वह बहुत निंदनीय है। चूंकि ठीक उसी दिन आदर्श आचार संहिता लागू हुई, ऐसे में चुनाव आयोग की आपत्ति वाजिब हो सकती है, केजरीवाल कह रहे हैं कि वह गुजरात के विकास की समीक्षा यात्रा पर गए हैं, मगर इस चुनावी समय में इसे राजनीति से जोड़कर तो देखा ही जाएगा। उनके दौरे से उन लोगों को तो खुश होना चाहिए, जो गुजरात के विकास मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की मांग करते हैं, लेकिन वहां केजरीवाल को विरोध का सामना करना पड़ा है।
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अलबत्ता केजरीवाल को हिरासत में लेने की सूचना पर आप के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भाजपा कार्यालयों पर जिस तरह हमला बोला, वह आपत्तिजनक है। अगर यह मान भी लें कि गुजरात सरकार के निर्देश पर केजरीवाल को हिरासत में लिया गया था, तब भी कुछ समय बाद उन्हें रिहा कर ही दिया गया। यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिस पर इतना आक्रामक होकर तोड़फोड़ पर उतारु हुआ जाए। तब तो और नहीं, जब आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है।
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वह अपने नेता को हिरासत में लिए जाने पर दूसरे तरीके से भी विरोध प्रकट कर सकती थी। पर इसके ब्योरे हैं कि आप के कुछ नेताओं ने एसएमएस के जरिये कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ जुटा ली। इससे पहले भी अपनी ताकत दिखाने के लिए वह इसी तरह का कदम उठा चुकी है। आप यह क्यों नहीं समझना चाहती कि वह कोई एनजीओ या आंदोलनकारी संस्था नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पार्टी है, जिसे मान्य तौर-तरीकों के अनुरूप ही चलना पड़ेगा। चुनाव आयोग ने चूंकि पूरे मामले की जांच बिठा दी है, लिहाजा असली तस्वीर जांच के बाद ही सामने आएगी। यह राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे टकरावों से बचें और चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने दें।

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