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पारदर्शिता के पुरोधा
नई दिल्ली
Updated Wed, 22 May 2013 09:49 PM IST
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कैग जैसी संस्था में अपनी परिवर्तनकामी भूमिका के लिए चर्चित विनोद राय की विदाई पिछली सदी के आखिरी दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन की गौरवशाली विदाई की याद दिलाती है।
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टी एन शेषन ने चुनाव आयोग को ताकतवर बनाने में अगर ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसाइटी के सक्रिय होने के इस दौर में विनोद राय ने कैग को एक पारदर्शी और जिम्मेदार संस्था बनाने में पूरी ताकत लगा दी।
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उन्हीं के कार्यकाल में यह स्पष्ट हुआ कि कैग सरकारी खर्च का ऑडिट करने वाली एक संस्था भर नहीं है, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग के बारे में देश को बताने का वह अधिकार भी उसके पास है, जो उसे संविधान ने दिया है।
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कैग के समूचे इतिहास में यह पहली बार था, जब 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन, कोल ब्लॉक आवंटन जैसे कई मामलों में उसकी शुरुआती ऑडिट रिपोर्टों ने न सिर्फ सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोली, बल्कि कई मंत्रियों को जाना भी पड़ा!
उसके इस साहस, बल्कि दुस्साहस, की सरकारी हलके में आलोचना होनी ही थी। कभी मंत्रियों ने घाटे के उसके आंकड़े को गलत बताया, तो कभी आरोप लगाया गया कि कैग लक्ष्मणरेखा लांघ रही है, पर इससे कैग के कामकाज पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा।
पहले तीन से चार साल में जारी होने वाली ऑडिट रिपोर्टें विनोद राय के समय में न सिर्फ पांच से छह महीने में आने लगीं, बल्कि इन्हें पाठकों के अनुकूल बनाया गया, ताकि लोग समझ सकें कि सरकारी धन का खर्च किस तरह हो रहा है।
सरकारी धन के दुरुपयोग को बताने के लिए इन रिपोर्टों में अनुमानित क्षति की अवधारणा को पहली बार शामिल किया गया, तो इसकी वजह यही है। कैग की कार्यसंस्कृति में आए इस बदलाव के कारण ही पहली बार उसे संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं का ऑडिट करने का मौका भी मिला। उसने यह मुकाम, जाहिर है, दुनिया की अन्य देशों की ऑडिट संस्थाओं को प्रतिस्पर्द्धा में हराकर हासिल किया।
विनोद राय ने इस संस्था को जिस ऊंचाई पर लाकर छोड़ा है, उसे देखते हुए नए कैग के लिए अपनी पहचान बनाना कठिन तो होगा ही, अच्छी बात यह है कि अब इस संस्था पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश भी शायद ही सफल हो।