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विकास के एजेंडे में गांव
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 12 Nov 2014 07:55 PM IST
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पिछले कुछ वर्षों में हमारी सत्ता राजनीति के एजेंडे में गांवों के विकास ने जिस तरह जगह बनाई है, इसका स्वागत करना चाहिए, चाहे वह यूपीए सरकार की लगभग अचर्चित रही प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना हो या मौजूदा सरकार की महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना। इसमें हर सांसद को तत्काल एक गांव गोद लेकर उसका विकास करना होगा। प्रधानमंत्री द्वारा आदर्श गांव चुन लेने के बाद इस योजना ने रफ्तार भी पकड़ी है।
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पर आलोचकों का मानना है कि जिस देश में लाखों गांव हैं, वहां कुछ सौ गांवों को आदर्श गांवों के रूप में चुनना भेदभाव और नाराजगी को जन्म देगा। यह आशंका निराधार नहीं है। अनेक सांसदों ने इसी वजह से अभी तक गांव गोद नहीं लिए हैं कि उन्हें दूसरे गांवों के मतदाताओं की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है! पर क्या इस कारण कुछ सौ पिछड़े गांवों को विकास की मुख्यधारा में लाने की योजना को निरस्त कर देना सही होगा? मोदी सरकार ने इस योजना का जो ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उसमें हर सांसद को 2019 तक तीन गांव विकसित करने होंगे। यानी अगर इस योजना पर ठीक से अमल होता है, तो पांच साल बाद करीब दो से ढाई हजार गांव विकास की कतार में खड़े होंगे। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं होगी। पर दूरदर्शी योजनाएं राजनीतिक संवेदनहीनता का किस तरह शिकार हो जाती हैं, यह इस नवोदित योजना के प्रारंभिक चलन को देखकर समझ में आ जाता है।
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सांसद आदर्श ग्राम योजना की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें गांव के चयन का कोई सामाजिक आधार नहीं है, जबकि पिछली सरकार ने जो योजना शुरू की थी, उसमें विकास के लिए वही गांव चुने जाने थे, जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या पचास प्रतिशत से अधिक हो। इसी खामी का नतीजा है कि कुछ गांवों के चयन पर अब सवाल उठ रहे हैं। मसलन, कुछ सांसदों ने ऐसे गांव चुने हैं, जिनसे उनके पुरखों की यादें जुड़ी हैं, कुछ ने ऐसे गांव चुने हैं, जो पहले से ही किसी सरकारी योजना का हिस्सा हैं, एक सांसद ने सोच-समझकर ऐसा गांव गोद लिया है, जिसमें एक भी मुस्लिम नहीं है, तो पिछड़े इलाकों में विकसित गांवों को गोद लेने के ब्योरे भी हैं।
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चूंकि प्रधानमंत्री ने इस योजना के प्रति दिलचस्पी दिखाई है, लिहाजा खुद उन्हें इस मामले में सक्रिय होना होगा, ताकि इसका हश्र भी दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह न हो।