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एक नायक की विदाई
Updated Wed, 06 Mar 2013 09:31 PM IST
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वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज का निधन समूचे दक्षिण अमेरिका के लिए शोकाहत करने वाला है, तो दुनिया भर के उन लोगों के लिए स्तब्ध करने वाला भी, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई को आश्चर्य के साथ देख रहे थे।
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वैचारिक प्रतिबद्धता का इससे बड़ा सुबूत क्या होगा कि कैंसर के इलाज के लिए उन्होंने विकसित देशों के बजाय क्यूबा को चुना। इक्कीसवीं सदी के पूंजीवादी विश्व में यह कॉमरेड राष्ट्रपति अनगिनत लोगों का नायक था। चे ग्वारा की रचनाओं ने उन्हें लड़ने की प्रेरणा दी, सिमोन बोलियवर के जीवन ने उन्हें सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाया, तो फिदेल कास्त्रो ने उन्हें साम्राज्यवाद के खिलाफ घुटने न टेकने का साहस प्रदान किया।
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अपने पहले राष्ट्रपति काल में उन्होंने हालांकि पूंजीवाद को गति देने वाली अर्थनीति का समर्थन किया था, पर जल्दी ही इसे तिलांजलि दे दी। उनकी बड़ी उपलब्धि यह है कि कम्युनिज्म के अवसान के दौर में उन्होंने अपनी वामपंथी-सामाजिक नीतियों से वेनेजुएला को सामाजिक-आर्थिक रूप से सक्षम बनाया।
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दो चीजें उनके पक्ष में जाती थीं। एक, क्यूबा, ब्राजील, बोलिविया, निकारागुआ, इक्वाडोर और अर्जेंटीना जैसे देशों में वामपंथ और समाजवाद की मजबूत परंपरा थी। दूसरे, विशाल तेल भंडार के कारण आर्थिक रूप से मजबूत वेनेजुएला अमेरिका से तकरार का साहस कर सकता था।
शावेज ने तेल कुओं का राष्ट्रीयकरण कर पहले तो वहां अमेरिकी वर्चस्ववाद को खत्म किया, फिर समाजवादी नीतियां अपनाते हुए भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया। हालांकि शावेज पर यह आरोप लगे कि लोकतांत्रिक रूप से चुनकर आने के बाद उन्होंने तानाशाह जैसा व्यवहार किया।
फिर समृद्ध वेनेजुएला में गरीबी और बेरोजगारी की मौजूदा स्थिति भी कम चिंतनीय नहीं। पर सच यह है कि शावेज को पूरे लैटिन अमेरिका की चिंता थी। उदार अर्थनीति को अपनाने के बाद दक्षिण अमेरिका की जैसी दुर्गति हुई, उसमें इस पूरे क्षेत्र को समाजवादी नीतियों के तले एकजुट करने की शावेज की योजना महत्वपूर्ण थी। उनके जाने से न सिर्फ वेनेजुएला, बल्कि उस क्यूबा के आर्थिक भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं, जिसे गति देने का काम उन्होंने अपने हाथ में लिया था।