{"_id":"d77073d8-de71-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"uttrakhand-disaster","type":"story","status":"publish","title_hn":"ऑपरेशन राहत के जांबाज","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
ऑपरेशन राहत के जांबाज
नई दिल्ली
Updated Wed, 26 Jun 2013 08:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड में 16 जून की रात आई आपदा से हुए पूरे नुकसान का अभी आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन इस तबाही का अंदाजा इससे ही लगता है कि दस दिन बीत जाने के बावजूद राहत और बचाव कार्य अब भी जारी है।
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय को राज्य सरकार की ओर से दिए गए हलफनामे पर यकीन करें, तो चारधाम और उनके रास्तों में फंसे बाकी लोगों को निकालने में अभी दो-तीन दिन का और वक्त लग सकता है। समस्या सिर्फ फंसे लोगों को बाहर निकालने भर की नहीं है, इस आपदा में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार को लेकर भी मुश्किलें आ रही हैं।
विज्ञापन
आपदा से सर्वाधिक प्रभावित रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और हरिद्वार जिलों में बुनियादी ढांचा बुरी तरह से तहस-नहस हो गया है। सड़कें बह गई हैं, संचार व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, तिस पर खराब मौसम राहत कार्य में बाधा बनकर खड़ा हो जाता है।
विज्ञापन
ऐसी विकट परिस्थितियों में भारतीय वायुसेना, आर्मी, आईटीबीपी और आपदा प्रबंधन से जुड़े जवान जिस मुस्तैदी के साथ अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को बचा रहे हैं और राहत पहुंचा रहे हैं, वह सचमुच तारीफ के काबिल है। यह वाकई बहुत दुखद है कि बचाव कार्य में जुटे 20 जवानों को गौरीकुंड के नजदीक एक हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण जान गंवानी पड़ी है।
वहां चलाया जा रहा भारतीय वायुसेना का 'ऑपरेशन राहत' देश में उसका सबसे बड़ा अभियान साबित हुआ है, जिससे आपदा की भीषणता का पता चलता है। असल में दुर्गम इलाका होने के कारण वहां राहत कार्य, मैदानी या तटीय इलाकों में होने वाले ऐसे अभियानों से कहीं अधिक मुश्किलों भरा है।
दुखद है कि सेना के जवान तो बचाव कार्य में लगे हैं, लेकिन दूसरी ओर राहत को लेकर राजनीति भी शुरू हो चुकी है। हालत यहां तक हो गई कि देहरादून हवाई अड्डे पर आंध्र प्रदेश से आए तेलुगू देशम और कांग्रेस के नेताओं के बीच हाथापाई तक हो गई। उससे पहले नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को लेकर भाजपा और कांग्रेस में खींचतान हो ही चुकी है।
तमाम राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि उत्तराखंड में जो कुछ हुआ है, वह किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है, जिससे उबरने के लिए सबके साझा प्रयास की जरूरत है।