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यूक्रेन में उथल-पुथल
नई दिल्ली
Updated Mon, 24 Feb 2014 08:30 PM IST
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राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे यूक्रेन की संसद द्वारा राष्ट्रपति विक्टर यांकोविच को हटाने के बावजूद हालात को सामान्य होने में थोड़ा वक्त लगेगा। यांकोविच अपने खिलाफ देश में बन रहे माहौल को या तो ठीक से भांप नहीं पाए या फिर उन्हें अपने सहयोगी रूस पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था।
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पिछले वर्ष नवंबर में उनके खिलाफ उस वक्त प्रदर्शन शुरू हुए थे, जब उन्होंने यूक्रेन को आर्थिक बदहाली से उबारने के लिए यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के बजाय रूस के बेल आउट पैकेज को मंजूरी दी थी। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, नतीजतन 80 से अधिक लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। यहां तक कि सशस्त्र बलों के प्रमुखों को भी उन्होंने मनमाने तरीके से हटा दिया था।
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दरअसल हंगरी, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया जैसे अपने पड़ोसी देशों को यूरोपीय संघ की सरपरस्ती में बढ़ते देखने वाला यूक्रेन का एक बड़ा तबका यूरोपीय संघ के साथ सुरक्षित भविष्य देख रहा है। मगर यांकोविच न तो यूरोपीय संघ की सदस्यता चाहते थे और न ही उसके साथ मुक्त व्यापार।
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वास्तव में यूक्रेन की लड़ाई सिर्फ उस देश तक सीमित नहीं है, इसकी आड़ में यूरोपीय संघ और रूस के बीच भी वर्चस्व को लेकर टकराव चल रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूरोपीय संघ के बरक्स पूर्व सोवियत संघ के तमाम देशों को मिलाकर यूरेसियन यूनियन बनाना चाहते हैं।
हकीकत यह है कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद स्वतंत्र हुआ यूक्रेन आज तक राजनीतिक रूप से स्थिर नहीं हो सका है। मगर जिस तरह से यांकोविच के खिलाफ जनक्रांति हुई, उससे उम्मीद की जा सकती है कि वहां जल्दी ही हालात बदलेंगे। बदले माहौल का ही असर है कि वहां तमाम विपक्षी दलों के बीच चुनाव को लेकर सहमित बन गई है और यांकोविच के खिलाफ 2004 की ऑरेंज क्रांति को अंजाम देने वाली पूर्व प्रधानमंत्री टिमशेंको भी जेल से बाहर आ गई हैं।
विपक्षी नेता चाहते हैं कि रूस यूक्रेन को उपनिवेश जैसा न माने, बल्कि बराबरी का दर्जा दे, अच्छे पड़ोसी का धर्म निभाए और यूरोप के साथ उसके रिश्तों का सम्मान करे। वाकई यूक्रेन की स्थिरता के लिए जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उसकी संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखे।