{"_id":"41fd5e9a-b993-11e2-811c-d4ae52bc57c2","slug":"upa-political-problems","type":"story","status":"publish","title_hn":"पटरी से उतरती सरकार","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
पटरी से उतरती सरकार
Updated Fri, 10 May 2013 10:31 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पवन कुमार बंसल के रेल मंत्री के पद से इस्तीफे के बावजूद यूपीए सरकार इस सवाल से बच नहीं सकती कि इस फैसले में आखिर इतना वक्त क्यों लगा?
विज्ञापन
यह नैतिकता में नहीं, चौतरफा दबाव और राजनीतिक मजबूरी में उठाया गया कदम दिख रहा है।
सच तो यह है कि बंसल को उसी दिन नैतिकता के आधार पर पद छोड़ देना चाहिए था, जिस दिन उनके भांजे को रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार के साथ मलाईदार पद पर नियुक्ति के लिए सौदेबाजी करते हुए सीबीआई द्वारा रंगे हाथ पकड़ा गया था।
विज्ञापन
मगर वह अपने बच निकलने के सारे मुमकिन रास्ते तलाशते रहे, उनकी पार्टी उनका बचाव करती रही और मनमोहन सरकार ऐसा जतलाती रही कि वह विपक्ष या किसी के दबाव में नहीं आने वाली है।
विज्ञापन
इस मामले ने रेल मंत्रालय में चल रहे गोरखधंधे को उजागर कर दिया है कि किस तरह रेलवे बोर्ड के अहम पदों पर नियुक्ति के लिए सौदेबाजी होती है। यह विडंबना ही है कि पवन कुमार बंसल के रूप में कांग्रेस को डेढ़ दशक बाद रेल मंत्री मिला था और उम्मीद की जा रही थी कि वह गठबंधन की राजनीति का शिकार हुए रेलवे को पटरी पर ले आएंगे!
मगर उन्होंने मंत्रालय के अहम पदों पर अपने कुनबे और करीबियों को जिस तरह बिठाया, उससे तो रेलवे किसी प्राइवेट लिमिटेड जैसा हो गया। बंसल की गिनती यूपीए के संजीदा मंत्रियों के रूप में होती रही है, लेकिन उनके परिजनों की कंपनियों ने उनके मंत्री बनने के बाद जिस तरह की ‘घोषित-अघोषित’ कमाई दर्ज की है, उससे न केवल उनकी, बल्कि पहले से गिरती जा रही यूपीए की साख को भी और धक्का लगा है।
इसके बावजूद यूपीए सरकार का रवैया बदलता नहीं दिख रहा है। वह घोटालों और भ्रष्टाचार के मामलों को जितना संभव हो सके, टालना चाहती है। इसी वजह से उसने संसद सत्र को समय से पहले खत्म करने से भी गुरेज नहीं किया। हालांकि दिखाया तो ऐसे जाता है, मानो पार्टी और सरकार में इन मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं, लेकिन केंद्र में सत्ता की जो व्यवस्था है, क्या वास्तव में उसमें ऐसा संभव है?
सरकार की नीयत यदि वाकई साफ होती, तो सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट पर सर्वोच्च अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद कानून मंत्री अश्विनी कुमार को भी पद से तुरंत हटा दिया जाता। अफसोस कि अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। हालांकि कल को उन्हें हटा भी दिया गया, तब भी यूपीए को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई जल्दी नहीं हो सकेगी।