{"_id":"d9fbe533c96fb25550f35b9de301d537","slug":"unwed-mother-s-right-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिन ब्याही मां के पक्ष में","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
बिन ब्याही मां के पक्ष में
नई दिल्ली
Updated Mon, 06 Jul 2015 08:28 PM IST
विज्ञापन
अविवाहित मां को अपने बच्चे का कानूनी तौर पर एकल अभिभावक स्वीकार करने से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय का फैसला स्त्री की निजता के सम्मान के साथ ही लैंगिक भेदभाव दूर करने की दिशा में वाकई मील का पत्थर है। एक अविवाहित मां के अपने बच्चे के संरक्षण का अधिकार हासिल करने से संबंधित मामले में दिए गए इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि संबंधित मां बच्चे के पिता का नाम सार्वजनिक किए बिना ही यह अधिकार हासिल कर सकती है।
निश्चय ही हमारा समाज बिन ब्याही मां को आज भी सहजता से नहीं लेता और ऐसी मांओं को भारी उपेक्षा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से यह स्थिति न केवल बदलेगी, बल्कि ऐसी मांएं अपने बच्चों की सही तरीके से परवरिश भी कर सकेंगी। बिन ब्याही ही नहीं, बल्कि ऐसी मांएं भी जो किसी वजह से अपने पति के साथ नहीं रहतीं, उन्हें भी बच्चे के संरक्षण का वैधानिक अधिकार हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है।
इस सिलसिले में लेखिका गीता हरिहरन का उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने पिता की अनुपस्थिति में (तलाक या अलग रहने की स्थिति) मां को बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक स्वीकार किया। वरना उससे पहले तो हिंदू अवयस्क एवं संरक्षण अधिनियम के मुताबिक पिता ही किसी बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक हो सकता था और पिता के बाद (यानी उसकी मृत्यु के बाद) मां को यह अधिकार हासिल था। इस स्थिति के लिए हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा सकता है, पर इस फैसले से सोच में बदलाव आएगा। ताजा मामले में तो संबंधित महिला का कहना है कि बच्चे के पिता को तो शायद यह पता ही न हो कि उनके रिश्ते से कोई बच्चा भी हुआ है।
विज्ञापन
ऐसे में कुछ सवाल भी उठते हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता, वह यह कि ऐसी स्थिति में बच्चे और पिता के रिश्ते को कैसे परिभाषित किया जाएगा और क्या बच्चे को पिता की संपत्ति या विरासत का कोई अधिकार होगा या नहीं? संभव है कि आने वाले समय में इसकी व्याख्या की जाए। बिन ब्याही मां के पक्ष में आया यह फैसला कानूनी जीत को रेखांकित करता है, जरूरत इसके अनुरूप समाज को बदलने की भी है।
विज्ञापन
निश्चय ही हमारा समाज बिन ब्याही मां को आज भी सहजता से नहीं लेता और ऐसी मांओं को भारी उपेक्षा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से यह स्थिति न केवल बदलेगी, बल्कि ऐसी मांएं अपने बच्चों की सही तरीके से परवरिश भी कर सकेंगी। बिन ब्याही ही नहीं, बल्कि ऐसी मांएं भी जो किसी वजह से अपने पति के साथ नहीं रहतीं, उन्हें भी बच्चे के संरक्षण का वैधानिक अधिकार हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है।
विज्ञापन
इस सिलसिले में लेखिका गीता हरिहरन का उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने पिता की अनुपस्थिति में (तलाक या अलग रहने की स्थिति) मां को बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक स्वीकार किया। वरना उससे पहले तो हिंदू अवयस्क एवं संरक्षण अधिनियम के मुताबिक पिता ही किसी बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक हो सकता था और पिता के बाद (यानी उसकी मृत्यु के बाद) मां को यह अधिकार हासिल था। इस स्थिति के लिए हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा सकता है, पर इस फैसले से सोच में बदलाव आएगा। ताजा मामले में तो संबंधित महिला का कहना है कि बच्चे के पिता को तो शायद यह पता ही न हो कि उनके रिश्ते से कोई बच्चा भी हुआ है।
विज्ञापन
ऐसे में कुछ सवाल भी उठते हैं, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता, वह यह कि ऐसी स्थिति में बच्चे और पिता के रिश्ते को कैसे परिभाषित किया जाएगा और क्या बच्चे को पिता की संपत्ति या विरासत का कोई अधिकार होगा या नहीं? संभव है कि आने वाले समय में इसकी व्याख्या की जाए। बिन ब्याही मां के पक्ष में आया यह फैसला कानूनी जीत को रेखांकित करता है, जरूरत इसके अनुरूप समाज को बदलने की भी है।