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बेकाबू होते हालात
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 16 Jun 2014 08:11 PM IST
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हाल ही में दिल्ली में हुई इन्वेस्टर्स समिट के दौरान कहा था कि सूबे की कानून- व्यवस्था कई राज्यों की तुलना में बेहतर है, और उनकी सरकार निवेशकों का भरोसा जीतने में सफल हुई है। मगर, बीते 48 घंटे के दौरान हुई कुछ घटनाएं उनके दावे को खारिज करती लगती हैं, जिसमें दो पुलिस वालों की हत्या कर दी गई, तो एक जगह दो मजदूरों को जिंदा जला दिया गया! यही नहीं, बलात्कार के भी कुछ नए मामले दर्ज किए गए हैं।
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हैरानी की बात यह है कि सूबे के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी अपनी पार्टी की सरकार को कोई दिशा-निर्देश नहीं दे पा रहे हैं। वह सूबे की कानून-व्यवस्था से कहीं अधिक अपनी पार्टी के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित लगते हैं। शायद इसके पीछे एक वजह यह भी हो कि लोकसभा चुनाव में राज्य की 80 में से 71 सीटें जीतने वाली भाजपा कानून-व्यवस्था की आड़ लेकर सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने का दबाव बना रही है। यदि प्रदेश सरकार कानून-व्यवस्था को लेकर जल्द ही कोई कड़ा संदेश देने में विफल रहती है, तो ऐसा दबाव और बढ़ सकता है। मगर इसके लिए सत्तारूढ़ दल को अपना राजनीतिक तौर-तरीका बदलना होगा।
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वास्तव में लोकसभा चुनाव में सपा को मिली करारी हार इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश सरकार निरंतर लोगों का भरोसा खोती जा रही है। पार्टी को यह सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि महज दो वर्ष पूर्व विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल कर सत्ता में आने के बाद वह लोकसभा चुनाव में सिर्फ पांच सीटों में सिमट कर रह गई। स्थिति यह है कि अखिलेश सरकार के 58 मंत्रियों में से सिर्फ नौ के विधानसभा क्षेत्रों में ही सपा को बढ़त मिल सकी।
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ऐसा लगता है कि मुलायम और अखिलेश, दोनों ही इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि उनकी सरकार प्रदेश के लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकी है। हकीकत यह भी है कि मुलायम सिंह विगत दो वर्षों के दौरान कई बार अपने मुख्यमंत्री पुत्र और उनके मंत्रियों को सार्वजनिक तौर पर हिदायत देते रहे हैं, इसके बावजूद हालात नहीं बदले हैं। यह विडंबना ही है कि एक युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव से जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी, वह उन पर खरा नहीं उतर सके हैं।