अशोभनीय आचरण
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एक कार्यक्रम में जमीन सौदे से जुड़े सवाल पूछे जाने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने एक संवाददाता के साथ जिस तरह बदसुलूकी की, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। वाड्रा के बचाव में उतरी कांग्रेस का तर्क है कि उकसावे वाले सवाल बार-बार नहीं पूछे जाने चाहिए। पर यह वाड्रा द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के बचाव का कवच नहीं हो सकता। अप्रिय लगते सवाल को वह शिष्टता से टाल सकते थे। इसके बजाय उन्होंने न सिर्फ रिपोर्टर का माइक झटक दिया, बल्कि अपने सुरक्षाकर्मियों से इससे जुड़ी फुटेज मिटा देने का भी निर्देश दिया।
मानो यह अक्खड़पन ही कम न हो, मामला तूल पकड़ने के बाद वाड्रा के दफ्तर की ओर से जो सफाइयां दी गईं, वे भी बहुत दमदार नहीं हैं। यह आचरण तब है, जब हरियाणा में जमीन सौदों में हुई गड़बड़ियां अब छिपी हुई नहीं हैं और बार-बार इससे संबंधित खुलासे आ ही रहे हैं। हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार के दौरान हुए जमीन सौदों पर तैयार की गई अपनी रिपोर्ट के पहले मसौदे में अब तो कैग ने भी माना है कि राज्य में जमीन के कारोबार में वाड्रा ने कानून से खिलवाड़ करते हुए चवालीस करोड़ रुपये कमाए हैं। कैग के मुताबिक, वाड्रा की कंपनी और हरियाणा सरकार के बीच हुए समझौते का उल्लंघन करते हुए वाड्रा को लाभ पहुंचाया गया, जिससे राज्य के खजाने को नुकसान पहुंचा। ऐसे में, वाड्रा ऐसे सवालों से कब तक कतराते रहेंगे और कांग्रेस कब तक उनका बचाव करती रहेगी!
लाजिमी तो यह था कि पहली बार यह मामला सामने आने के बाद कांग्रेस खुद आगे बढ़कर इसकी सच्चाई की तह में जाने की प्रतिबद्धता दिखाती। इसके बजाय बिल्कुल शुरुआत से ही उसने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। कैग का ताजा आकलन अशोक खेमका के खुलासे से बहुत मिलता-जुलता है, पर तब हरियाणा की हुड्डा सरकार ने खेमका का तबादला करके यही संदेश दिया था कि वह मामले की सच्चाई को सामने नहीं आने देना चाहती।
बेशक, इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए, पर कैग के खुलासे के बाद इस मामले की न सिर्फ जांच होनी चाहिए, बल्कि दोषियों को सख्त सजा दिलाना भी उतना ही जरूरी है। जहां तक कांग्रेस के रवैये का सवाल है, तो अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही यह पार्टी इस तरह के मामलों का बचाव कर अपना और नुकसान ही करेगी।