स्वच्छ भारत की असलियत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विगत दो अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जोर-शोर से स्वच्छता अभियान शुरू करने के बावजूद केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए एक सर्वे में देश के शहरों की जो हकीकत सामने आई है, वे बेहद चौंकाने वाली है। खुले में शौच, कूड़ा निस्तारण, पेयजल की गुणवत्ता आदि के पैमाने पर एक लाख से अधिक की आबादी वाले कुल 476 शहरों की जो सूची बनाई गई, उसमें कर्नाटक का मैसूर देश का सबसे स्वच्छ शहर बनकर उभरा है, तो मध्य प्रदेश का दमोह सबसे गंदा शहर है। इसी तरह बंगलूरू देश की सबसे स्वच्छ राजधानी है, तो पटना सबसे गंदी राजधानी। आलम यह है कि शीर्ष दस शहरों में एक भी हिंदी भाषी राज्यों से नहीं है, और पहले सौ शहरों में उत्तर भारत के सिर्फ बारह शहर हैं!
सवाल यह है कि सक्रिय राजनीतिक अभियानों के बावजूद उत्तर भारत के शहर सफाई के मोर्चे पर फिसड्डी क्यों हैं। दूसरी ओर, साफ-सफाई के राजनीतिक अभियानों के बगैर भी दक्षिण भारत के शहर इतने साफ-सुथरे कैसे हैं? वे इसलिए साफ-सुथरे हैं, क्योंकि स्वच्छता राजनीतिक प्रयासों से नहीं, बल्कि लोगों और समाज की मानसिकता बदलने से आती है। नेताओं की मौजूदगी में अचानक एक दिन कैमरों के सामने झाड़ू पकड़ लेने भर से सफाई नहीं होती, बल्कि उसके लिए सतत प्रयास जरूरी है। यह कोई रहस्य नहीं है कि दक्षिण भारत में शहरी विकास का ढांचा सुनियोजित ढंग से निर्मित है। शौचालय, कूड़ा निस्तारण, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई तथा पेयजलों की गुणवत्ता के मामले में भी वे सजग हैं। दूसरी ओर, उत्तर भारत में सार्वजनिक स्थलों पर थूकने, खुले में शौच करने या कूड़ों को कहीं भी फेंक देने की आदत है। यहां न तो पेयजल की गुणवत्ता कभी मुद्दा बनती है, न ही शहरों को प्रदूषण मुक्त करने की दिशा में नागरिक प्रयास होते हैं।
हमने शहरी-महानगरीय जीवन को भीड़-भाड़ और असुविधा, वाहनों की रेलमपेल, पर्यावरण मानकों की अनदेखी और जैसे-तैसे जीने का पर्याय मान लिया है। हमें यह समझने की जरूरत है कि उत्तर भारत स्वच्छता के पैमाने पर जब कभी खरा उतरेगा, तो वह सरकारों और राजनीतिक पार्टियों की कोशिशों से नहीं, बल्कि लोगों और समाज की सोच बदलने से ही संभव होगा।