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भूमि अधिग्रहण की फांस
नई दिल्ली
Updated Mon, 23 Feb 2015 08:22 PM IST
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बजट सत्र केंद्र की करीब नौ महीने पुरानी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। पेट्रोलियम मंत्रालय में जासूसी का खुलासा तो उसके लिए असहज करने वाला है ही, शीत सत्र के बाद वह जो भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लेकर आई थी, उसके खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक पर मोर्चेबंदी हो रही है। विपक्ष को साधने के लिए रविवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी, खासकर इस अध्यादेश के प्रति विपक्षी पार्टियों के तेवर सख्त थे।
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सरकार के लिए ज्यादा चिंताजनक यह है कि ठीक बजट सत्र की शुरुआत के दिन अन्ना हजारे ने इस अध्यादेश के विरोध में आंदोलन प्रारंभ किया। उसकी मुश्किल इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े किसान व मजदूर संगठन इस अध्यादेश का विरोध कर रहे हैं; खुद गोविंदाचार्य तो अन्ना आंदोलन के साथ हैं ही। सत्ता में आने के बाद खासकर अरुण जेटली यूपीए द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण कानून का जिस तरह विरोध कर रहे थे, उससे यह तो साफ था कि नई सरकार इसमें बदलाव करेगी।
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पर लगता है, सरकार को इसका तनिक एहसास नहीं था कि कृषि जिस देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, वहां जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को उद्योग घरानों के हित में करना नुकसानदेह हो सकता है। उसने न सिर्फ जमीन अधिग्रहण में किसानों की सहमति की शर्त की लगभग अनदेखी कर दी, बल्कि तय अवधि तक परियोजना शुरू न होने पर किसानों को जमीन लौटाने और सोशल सर्वे के प्रावधान को खत्म कर दिया। इस तरह का एक अध्यादेश लाते हुए सरकार यह तक भूल गई कि इससे उसे किसानों का गुस्सा झेलना पड़ सकता है, जिसका असर उसकी छवि पर पड़ना लाजिमी है।
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अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेने से कम पर राजी नहीं हैं। यही नहीं, अनशन के बजाय जेल भरो अभियान को इस बार उन्होंने अपने आंदोलन की रणनीति बनाई है। चौतरफा विरोध को देखते हुए सरकार बीच का रास्ता निकालने के लिए राजी तो है, पर यह देखना अभी बाकी है कि अन्ना के आंदोलन से मिला नैतिक बल विपक्ष में इस मुद्दे पर कितनी एकजुटता, और सरकार के रुख में कितनी नरमी ला पाता है। इसके बावजूद संसद का पिछला सत्र चूंकि ज्यादातर आरोप-प्रत्यारोपों में ही जाया हो गया था, इसलिए इस महत्वपूर्ण सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों से संजीदगी की उम्मीद तो है ही।