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मौत की पटरियां
नई दिल्ली
Updated Tue, 20 Aug 2013 12:25 AM IST
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सहरसा के धमारा घाट रेलवे स्टेशन के नजदीक हुए हादसे ने रेलवे के साथ ही स्थानीय प्रशासन की लापरवाहियों को उजागर किया है। ऐसे हर हादसे के बाद रेलवे सुरक्षा को लेकर अक्सर बहस की जाती है और विभिन्न कमेटियों की रिपोर्ट्स का हवाला दिया जाता है, लेकिन इस हादसे के बारे में यह दावे से कहा जा सकता है कि थोड़ी-सी भी सावधानी बरती जाती, तो इसे टाला जा सकता था।
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हादसे की ठीक-ठीक वजह तो जांच के बाद ही पता चलेगी, लेकिन जब यह पता था कि वहां सोमवार को श्रद्धालुओं की वजह से सामान्य दिनों की तुलना में अधिक भीड़ हो सकती है, तो एहतियात बरता जा सकता था। यह हादसा इतना दर्दनाक है कि कुछ पल के भीतर ही अनेक लोग तेज रफ्तार एक्सप्रेस ट्रेन की चपेट में आकर जान गंवा बैठे और कई बुरी तरह घायल हो गए।
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सवाल है कि लोग पटरियों पर कैसे आ गए? वह कोई प्रदर्शन तो कर नहीं रहे थे, तो फिर उन्हें वहां से हटाने में दिक्कत क्या थी? असल में इस हादसे ने छोटे रेलवे स्टेशनों की दुर्दशा को भी उजागर किया है, जहां लंबी दूरी की तेज रफ्तार ट्रेनें नहीं रुकतीं और जहां पटरियों को पार करने की कोई व्यवस्था नहीं होती।
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इतने बड़े हादसे के बाद लोगों की नाराजगी स्वाभाविक है, क्योंकि मृतकों में अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं। हादसे के बाद रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अरुणेंद्र कुमार ने एक मार्के की बात की है कि इस हादसे के लिए समुचित सड़क नेटवर्क का न होना भी जिम्मेदार है।
हाल के वर्षों में रेलवे पर खासा दबाव बढ़ा है, उस पर रोजाना सवा दो करोड़ यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है। मगर जिस तादाद में यात्री और ट्रेनें बढ़ी हैं, उस रफ्तार से पटरियों और अन्य सुविधाओं का विस्तार नहीं हुआ है। इसके बावजूद रेलवे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
बात सिर्फ रेलवे की नहीं है, नीतीश कुमार बिहार के विकास मॉडल का दावा करते हैं, लेकिन धमारा घाट की हालत यह है कि घायलों को समय पर उपचार तक नहीं मिल सका। यह पीड़ादायक है कि इस भीषण हादसे पर संवेदना जताने और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय रेल राज्य मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री आरोप-प्रत्यारोप में उलझ गए हैं।