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ऐतिहासिक समझौते की ओर

Fri, 03 Apr 2015 08:15 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 03 Apr 2015 08:15 PM IST
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 towards The historic agreement

अमेरिका की अगुआई में विश्व की छह बड़ी ताकतों और ईरान के बीच यह सहमति बन गई है कि तेहरान अपना परमाणु कार्यक्रम सीमित करेगा और बदले में उसके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध हटाए जाएंगे। हालांकि अभी यह अंतरिम समझौता ही है, और अंतिम समझौते की रूपरेखा जून तक स्पष्ट हो पाएगी, पर इससे लंबे समय से जारी संशय और भय के माहौल को शांत करने में मदद मिलेगी।

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ईरान परमाणु कार्यक्रम को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी बताता रहा है, पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी तक ने इसे संदिग्ध बताया था, जिससे इस बात को बल मिला कि ईरान परमाणु बम बनाने के नजदीक पहुंच गया है। यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम जारी रहने के साथ ही यह आशंका लगातार इसलिए बनी रही, क्योंकि ईरान अपने परमाणु संयंत्रों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी से इन्कार करता रहा है। इसकी कीमत भी उसे भारी आर्थिक प्रतिबंधों के रूप में चुकानी पड़ी। हालत यह हो गई कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों की वजह से वह पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।
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करीब एक दशक की मशक्कत के बाद सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों और जर्मनी के साथ बनी सहमति के बाद अब उस पर लगे प्रतिबंधों के हटने का रास्ता साफ हो गया है। यही वजह है कि समझौते पर सहमति की घोषणा के बाद आम ईरानियों ने सड़कों पर उतरकर खुशियों का इजहार किया है। यह घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के संबंधों के लिहाज से ऐतिहासिक कहा जा सकता है, क्योंकि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से दोनों देशों के बीच करीब चार दशक तक संवादहीनता थी।
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समझौते का असर न केवल इन दोनों देशों के रिश्ते पर, बल्कि पश्चिम एशिया में भी पड़ सकता है, जहां हालात संकटपूर्ण हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इस्लामिक स्टेट के खिलाफ ईरान अमेरिका के नए सहयोगी के रूप में तो नहीं उभरेगा। इसी तरह यह भी साफ नहीं है कि अमेरिका के साथ ईरान के सुधरते रिश्ते को सुन्नी अरब देश किस तरह लेते हैं? वास्तव में इस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने के साथ ही अमेरिका और पश्चिमी देशों को सुनिश्चित करना है कि इससे कोई नए तरह की चुनौती सामने न आए।

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