नए आर्थिक संकट की ओर!
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अमेरिका में आंशिक कामबंदी नई भले न हो, लेकिन वहां की संसद ने जिद पर अड़े रहने का जो समय चुना है, उसका भीषण नतीजा अमेरिका के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी भुगतना पड़ेगा। करीब दो दशक बाद हुई इस आंशिक कामबंदी से वहां करीब आठ लाख लोगों को बिना वेतन के घर बैठ जाना पड़ा है, जबकि दस लाख से अधिक कर्मचारियों को आवश्यक सेवाओं के तहत तब तक बगैर वेतन के काम करना पड़ेगा, जब तक गतिरोध सुलझ नहीं जाता! शुक्र है कि अमेरिका में रेलवे, एयरलाइंस, होटल, बैंक तथा कुछ दूसरी सेवाएं सरकार द्वारा संचालित नहीं हैं, और सेना पर इस कामबंदी का असर नहीं पड़ने वाला।
इसके बावजूद यह आश्वस्त होने का अवसर इसलिए नहीं है कि वेतन से वंचित करीब अट्ठारह लाख लोग जब खर्च नहीं कर पाएंगे, तो अर्थव्यवस्था के नीचे जाते भला कितनी देर लगेगी! मौजूदा गतिरोध के लिए ज्यादा जिम्मेदार रिपब्लिकन्स ही हैं, जो ओबामा की महत्वाकांक्षी हेल्थकेयर योजना को एक साल के लिए टाल देने की मांग पर अड़े हुए हैं, जबकि इसके ज्यादातर प्रावधान लागू हो चुके हैं। लेकिन सत्ता में होने के कारण डेमोक्रेट्स की यह जिम्मेदारी तो बनती है कि वे गतिरोध को जितनी जल्दी हो सके, टालने का रास्ता निकालें।
यदि मध्य अक्तूबर तक मामला न सुलझा, तो अमेरिकी कर्ज की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव मंजूर नहीं हो पाएगा, जिससे अमेरिका के दिवालिया होने का खतरा पैदा हो सकता है, जो ज्यादा बड़ा आर्थिक संकट होगा। लंबी सुस्ती के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे खड़ी हो रही थी, जिससे दुनिया भर में उम्मीद बनने लगी थी। यूरो-जोन में सुधार के नतीजे दिख रहे थे, तो अपने यहां औद्योगिक उत्पादन भी गति पकड़ने लगा था और निर्यात भी।
लेकिन अगर अमेरिका ही दिवालिया हो जाए, तो विश्व अर्थव्यवस्था का क्या होगा! कुछ आशावादियों को उम्मीद है कि अमेरिका में मौजूदा गतिरोध लंबा खिंच जाने पर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को लाभ हो सकता है, लेकिन भूमंडलीकृत विश्व व्यवस्था में अमेरिका और यूरोप की आर्थिक बदहाली का जो हश्र हमने देखा है, उससे बहुत खुश नहीं हुआ जा सकता। लिहाजा इस गतिरोध के टूटने में ही सबकी भलाई है।