इतनी देर से

नई दिल्ली Updated Fri, 31 Jan 2014 07:50 PM IST
Too late
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, मगर वह अपने उत्तराधिकारी के लिए पहाड़ जैसी चुनौती छोड़कर जा रहे हैं।

दो वर्ष से भी कम का उनका कार्यकाल उनके मुख्यमंत्री बनने के दिन से ही विवादों में रहा, और सच तो यह है कि उन्हें कांग्रेस के नवनिर्वाचित विधायकों की मर्जी के विरुद्ध कांग्रेस आलाकमान ने ऊपर से थोपा था। इसका खामियाजा भी पार्टी को तुरंत भुगतना पड़ा, जब उनके इस्तीफा देने के बाद टिहरी लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनके बेटे को हार का मुंह देखना पड़ा। अपने इस छोटे कार्यकाल में बहुगुणा ने प्रशासनिक दूरदर्शिता तो नहीं दिखाई, बल्कि उन्हें उत्तराखंड में आई भीषण तबाही के दौरान बरती गई अकर्मण्यता के लिए ही याद किया जाएगा। हकीकत यह है कि जब उन्हें देहरादून से राहत और बचाव कार्य का संचालन करना चाहिए था, वह आलाकमान के दरबार में हाजिरी लगाते नजर आए थे!

राज्य को कई दशक पीछे धकेल देने वाली इस त्रासदी के बाद से ही बहुगुणा को हटाने का दबाव था, मगर कांग्रेस आलाकमान इस फैसले को टालता रहा। हैरत की बात यह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की पैरवी कर रहे हैं, और जैसा कि उन्होंने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा भी कि प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार सांसदों को है। मगर हकीकत यह है कि कांग्रेस शासित राज्यों में मुख्यमंत्री का फैसला आलाकमान ही करता आया है।

यह परंपरा इंदिरा गांधी के जमाने से चली आ रही है। 1970 से 80 का दशक तो ऐसा था कि कांग्रेस आलाकमान ने ताश के पत्तों की तरह मुख्यमंत्री बदले थे। मसलन मध्य प्रदेश में श्यामाचरण शुक्ल को हटाकर प्रकाश चंद्र सेठी को और फिर उन्हें हटाकर फिर से शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाया गया; या फिर उसी दौर में आंध्र प्रदेश में महज चार साल के दौरान तीन मुख्यमंत्री बदल दिए गए!

वास्तव में पार्टी आलाकमान ने हरीश रावत की लोकप्रियता और स्थानीय स्तर पर पार्टी से उन्हें मिल रहे समर्थन को नजरंदाज कर विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी की थी। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने अब भले ही आगामी आम चुनाव के मद्देनजर बहुगुणा को हटाने का फैसला लिया है, लेकिन उनकी जगह जो नया नेता मुख्यमंत्री के पद पर बैठेगा, उस पर राज्य के नवनिर्माण के साथ ही अलोकप्रिय हो रही पार्टी का आधार मजबूत करने की भी जिम्मेदारी होगी।

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