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संसद का समय

Fri, 07 Feb 2014 06:48 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 07 Feb 2014 06:48 PM IST
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time of parliament

इसमें संदेह नहीं कि पंद्रहवीं लोकसभा भारत के अब तक के संसदीय इतिहास में सर्वाधिक अनुत्पादक लोकसभा के रूप में दर्ज होने जा रही है। मगर हैरत की बात है कि इस गिरावट को लेकर राजनीतिक वर्ग में किसी तरह की चिंता दिखाई नहीं देती। संसदीय कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सामंजस्य की जरूरत पड़ती है, मगर यहां तो दोनों दो छोर पर खड़े नजर आ ही रहे हैं, सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर भी तेलंगाना के मुद्दे पर खासा घमासान मचा हुआ है।

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इस लोकसभा के आखिरी सत्र का पहला हफ्ता जिस तरह शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया, उसमें उम्मीद नहीं की जा सकती कि बचे आठ-दस दिनों में कोई खास कार्य हो पाएगा। हालांकि सरकार ने इस सत्र के लिए 39 विधेयक सूचीबद्ध कर रखे हैं, मगर उसका जोर भी कुछ खास विधेयकों पर ही दिखता है। बात सिर्फ इस सत्र की नहीं है, इस पूरी लोकसभा के दौरान संसदीय कार्यवाही खासी बाधित रही है।
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हालत यह है कि प्रश्नकाल की कार्यवाही तक ठीक से नहीं हो पा रही है, जबकि प्रश्नकाल लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों को वह अवसर प्रदान करता है, जिसमें वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों के साथ ही देश के व्यापक हितों से जुड़े मसले उठा सकते हैं। वास्तव में इसके जरिये सरकार को जवाबदेह बनाया जा सकता है, लेकिन यहां तो सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सदस्य सबसे पहले प्रश्नकाल को ही बाधित करने पर आमादा हो जाते हैं।
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इस सत्र में तो खैर सदन चल ही नहीं पा रहा है, लेकिन इसी लोकसभा में दिसंबर, 2009 में ऐसा मौका भी आया था, जब प्रश्नकाल के लिए सूचीबद्ध 34 सदस्य सदन से ही गायब थे! हैरत नहीं, इसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी सदस्य थे। इस लोकसभा में खाद्य सुरक्षा विधेयक और लोकपाल तथा लोकायुक्त विधेयक जैसे अपवादों को छोड़ दिया जाए-जिन्हें पारित होने से पहले सदन में नौ-दस घंटे बहस हुई- तो सदस्यों की रुचि विधेयकों पर बहस करने में भी नहीं दिखाई देती।


हैरान नहीं होना चाहिए कि पिछले पांच वर्ष के दौरान तकरीबन सभी वित्त विधेयक तकरीबन बिना बहस के ही पारित करा दिए गए! इससे पता चलता है कि हमारे माननीय सदस्य संसद की गरिमा और अपने सांविधानिक दायित्वों को लेकर  कितने गंभीर हैं? यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद का काम सिर्फ कानून बनाना नहीं, बल्कि दूसरी सांविधानिक संस्थाओं को दिशा देना भी है।

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