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पाकिस्तान के रास्ते
नई दिल्ली
Updated Tue, 21 Apr 2015 08:00 PM IST
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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दो दिवसीय पाकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का निहित अर्थ सिर्फ उनके आर्थिक हितों से ही नहीं जुड़ा हुआ है, बल्कि इसमें दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती सामरिक और रणनीतिक मंशा भी साफ देखी जा सकती है।
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चीन और पाकिस्तान की दोस्ती नई नहीं है और यह भारत से उनके रिश्तों से निरपेक्ष भी नहीं है। भारत की आपत्तियों को नजरंदाज कर चीन भारत की सीमा से सटे इलाके में पाकिस्तानी परियोजनाओं को मदद करता आया ही है। लिहाजा जिनपिंग की यात्रा को भारत के हितों के संदर्भ में देखने की जरूरत है। दोनों देशों के बीच कोई 51 समझौते हुए हैं, जिनके तहत चीन वहां 46 अरब डॉलर का भारी भरकम निवेश करने वाला है। इनमें से अधिकांश समझौते दोनों देशों के बीच 3,000 किलोमीटर लंबा आर्थिक गलियारा बनाने से जुड़े हुए हैं, जो चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ देगा, जिससे चीन की पहुंच सीधे अरब सागर तक हो जाएगी।
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इससे पश्चिम एशिया के तेल आपूर्तिकर्ता देशों से चीन की दूरी 12 हजार किलोमीटर तक कम हो जाएगी। मगर भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यह प्रस्तावित गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने वाला है, जहां से पाकिस्तान लगातार भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देता आया है। इसके साथ ही ध्यान रहे कि इस ग्वादर बंदरगाह का निर्माण भी चीन ने 2007 में किया था।
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चीन इसी तरह श्रीलंका में भी एक बंदरगाह की बड़ी परियोजना में निवेश कर हिंद महासागर में अपनी पहलकदमी दिखा चुका है। हालांकि वहां महिंदा राजपक्षे की जगह सिरिसेना सरकार के आने के बाद से यह योजना सुस्त पड़ गई है। मगर अरब सागर से लेकर हिंद महासागर तक पहुंच बनाने की चीन की मंशा अब किसी से छिपी नहीं है। इससे उसके आर्थिक हित तो जुड़े हैं ही, वह इस क्षेत्र में अपना दबदबा भी कायम करना चाहता है।
जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसकी प्रतिबद्धता संदिग्ध रही है, जिसके फलस्वरूप उससे अमेरिका की सरपरस्ती कम हुई है। असल में चीन के प्रति उसकी बढ़ती निर्भरता की यही सबसे बड़ी वजह भी है।