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इससे नुकसान ही होगा
नई दिल्ली
Updated Sun, 14 Sep 2014 06:58 PM IST
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महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीना पहले दो पुराने राजनीतिक सहयोगी दल भाजपा और शिवसेना के बीच जिस तरह की दरारें दिख रही हैं, वे चिंताजनक ही हैं। शनिवार को शिवसेना के मुखपत्र सामना ने अपने संपादकीय में लिखा कि ज्यादा लालच करने से रिश्ते टूट जाते हैं।
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यह दरअसल अपने सहयोगी भाजपा पर कटाक्ष था, जो इस बार ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि शिवसेना इसके लिए राजी नहीं है। शनिवार को ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक टेलीविजन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर करते हुए जनता से एक मौका देने की भी अपील की। जिस समय शिवसेना और भाजपा को चुनावी लड़ाई के लिए कमर कस लेनी चाहिए, तब तक उनके बीच सीटों पर भी तालमेल नहीं हुआ है!
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इस गतिरोध के लिए फौरी तौर पर तो शिवसेना ही ज्यादा जिम्मेदार लगती है। यह ठीक है कि महाराष्ट्र में उसकी मजबूत जमीन है और वहां भाजपा उसके सहारे ही सफलता हासिल करती रही है। लेकिन इधर खुद शिवसेना का प्रदर्शन भाजपा से कमतर रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में उसने भाजपा से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सीटें उसे भाजपा से कम मिली थीं। फिर चुनाव से पहले दबाव की ऐसी राजनीति क्यों?
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उद्धव ठाकरे का कहना है कि महाराष्ट्र में मोदी लहर नहीं चलने वाला। यह बिल्कुल हो सकता है कि महाराष्ट्र के चुनाव में भाजपा को वैसी सफलता नहीं मिले, जिसकी वह उम्मीद कर रही है; वैसे भी विधानसभा चुनाव के मुद्दे लोकसभा से अलग होते हैं। लेकिन ठाकरे की यह जिद पच्चीस साल पुराने गठबंधन के लिए महंगी पड़ सकती है।
दरअसल गोपीनाथ मुंडे की असामयिक मौत से, जिन्हें इस बार महाराष्ट्र में भाजपा के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार माना जा रहा था, भाजपा थोड़ी रक्षात्मक हो गई है। शायद यही शिवसेना के आक्रामक होने की वजह भी है। नहीं तो यही उद्धव ठाकरे कुछ महीने पहले तक महाराष्ट्र में नेतृत्व के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी का कहा मानने की बात कर रहे थे। जब एकाधिक घोटालों के कारण बदनाम हो चुकी राज्य की कांग्रेस-एनसीपी की सरकार को भाजपा के साथ मिलकर सत्ता से बाहर करने का सुनहरा मौका है, तब शिवसेना की नाहक जिद से नुकसान ही हो सकता है। खुद भाजपा के लिए भी भलाई इसी में है कि वह इस विवाद का हल शिवसेना के साथ मिल-बैठकर ढूंढे।