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तीसरा पक्ष नामंजूर

Mon, 23 Mar 2015 08:19 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 23 Mar 2015 08:19 PM IST
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Third man not acceptable

पाकिस्तान के नेशनल डे के मौके पर भारत में उसके उच्चायुक्त अब्दुल बासित द्वारा जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की मेजबानी का साफ मतलब है कि पड़ोसी मुल्क किसी भी तरह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान जम्मू-कश्मीर की ओर खींचना चाहता है।

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बासित के इस न्योते को पाकिस्तानी राष्ट्रपति ममून हुसैन के बयान से जोड़कर देखना चाहिए, जिसमें उन्होंने एक ओर तो भारत से दोस्ती की पेशकश की है और दूसरी ओर, कश्मीर मसले को दशकों पहले नकार दिए गए संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के जरिये सुलझाने की वकालत की है। दरअसल यह पाकिस्तान की पुरानी चाल है, जिसमें हर बार वह मात खाता आया है। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पेशकश से महज दो दिन पहले ही सांबा और कठुआ सेक्टर पर पाकिस्तान की ओर से हमले किए गए। हैरानी की बात यह है कि खुद भी आतंकवाद का शिकार होने के बावजूद पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी और अलगाववादी गतिविधियों को अंजाम देता आया है। बेशक जम्मू-कश्मीर सहित सभी द्विपक्षीय मसलों को बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है, लेकिन यह बातचीत हिंसा और आतंकी माहौल में नहीं हो सकती। इसके लिए परस्पर विश्वास की भी जरूरत है।
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इसके अलावा भारत ने दो टूक दोहराया है कि द्विपक्षीय बातचीत में हुर्रियत सहित किसी भी तीसरे पक्ष की जगह नहीं है। मगर, जब-जब दोनों देशों के रिश्ते सामान्य होते दिखते हैं, पाकिस्तान की ओर से कभी आतंकी हमले या फिर अलगाववादियों को बेवजह तवज्जो देकर भड़काने वाली कार्रवाई की जाती है। मीर वाइज उमर फारूक, सैयद अली शाह गिलानी सहित अन्य नेताओं के साथ हाल ही में जेल से बाहर आए मसर्रत आलम को भी आमंत्रित करने को आखिर क्या समझा जाए!
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जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव ने यह सुबूत दिया कि किस तरह हुर्रियत कॉन्फ्रेंस अब थके-हारे और चुके हुए नेताओं का जमावड़ा भर रह गई है, पर पाकिस्तान उन्हें बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। वास्तव में केंद्र की मौजूदा एनडीए सरकार को भी पाकिस्तान और हुर्रियत को लेकर अपने रुख में निरंतरता लाने की जरूरत है। उसे इस बात का ध्यान रखना होगा कि उसकी प्रतिक्रिया से अलगाववादी नेताओं को अनावश्यक महत्व न मिले।

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