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उन्हें आईएएस नहीं चाहिए

Fri, 09 Aug 2013 08:55 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 09 Aug 2013 08:55 PM IST
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they don't want IAS

गौतमबुद्ध नगर की निलंबित एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल पर टिप्पणी के संदर्भ में पहले वरिष्ठ सपा नेता रामगोपाल यादव ने, फिर नगर विकास मंत्री आजम खान ने आईएएस अधिकारियों के औचित्य पर ही जिस तरह सवाल उठाए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। इसकी शुरुआत सपा का बौद्धिक चेहरा माने जाने वाले रामगोपाल यादव ने यह कहकर की थी कि केंद्र सरकार सभी आईएएस अफसरों को चाहे, तो वापस बुला सकती है, हम राज्य के अधिकारियों से ही काम चला लेंगे। बाद में आजम खान ने उस बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जिस मुल्क में सवा सौ करोड़ काबिल लोग हों, वहां देश चलाने के लिए आईएएस अधिकारियों की जरूरत ही नहीं है।

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क्षेत्रीय राजनीति के वर्चस्व के दौर में ये दो टिप्पणियां सबसे पहले तो उस सांविधानिक व्यवस्था की ही धज्जियां उड़ाती हैं, जिसके तहत राज्यों और केंद्र की नीतियों में समन्वय स्थापित करने के लिए अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा का प्रावधान किया गया है। यह राज्य सरकार और राज्य के अधिकारियों के बीच पुल का काम करती है।
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समकालीन राजनीति का जो हाल हुआ है, उसमें केंद्रीय नौकरशाही की यह व्यवस्था अगर न हो, तो मंत्रियों और राज्य के अधिकारियों का गठजोड़ अपने हित साधने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देगा। राज्यों के अधिकारियों के साथ सरकारों को अमूमन कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन केंद्रीय अधिकारियों से उनके हित टकराते हैं, और उसी के नतीजे में यह विरोध शुरू होता है।
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केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारियों के साथ यह सुलूक केवल उत्तर प्रदेश में नहीं है; कांग्रेस शासित हिमाचल और राजस्थान में भी ईमानदार आईएएस अधिकारी व्यवस्था के निशाने पर हैं। दुर्गा शक्ति को मुद्दा बनाने वाली कांग्रेस अशोक खेमका के मामले में चुप है, जिन्हें उनकी ईमानदारी की सजा हर बार तबादले के रूप में मिलती है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि दो पार्टियों द्वारा बारी-बारी से शासित उत्तर प्रदेश उन राज्यों में है, जहां नौकरशाही का राजनीतिक हित में बहुत अधिक दुरुपयोग होता है। यहां सत्ता पलटते ही थोक के भाव स्थानांतरण होते हैं और निष्ठावानों को प्रोन्नत किया जाता है।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण का अधिकार राज्यों के हाथ में होने का अर्थ यह नहीं कि ईमानदार अधिकारियों को सजा दी जाए। आईएएस अधिकारियों के बारे में कुछ भी कहने वाले वरिष्ठ सपा नेताओं को अपने ही पार्टी के रामजीलाल सुमन के विचारों पर गौर फरमाना चाहिए।

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