दस्तक देने वे फिर आ रहे हैं

नई दिल्ली Updated Thu, 04 Oct 2012 09:52 PM IST
they are coming to knock
कैसा संयोग है, आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार जिस दिन अपनी फालतू जमीन बेचने का फैसला ले रही थी, उसके अगले दिन करीब पचास हजार भूमिहीन जमीन के लिए दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे! मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश होते हुए ये लोग इस महीने के अंत में जब दिल्ली पहुंचेंगे, तब इनकी संख्या एक लाख या उससे भी अधिक हो जाने की उम्मीद है।

सरकारी योजनाओं के कारण विस्थापित, व्यवस्था के हाथों लुटे-पिटे या पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन से वंचित ये वे लोग हैं, जो रोजी-रोटी के अलावा सिर पर छत के लिए थोड़ी-सी जमीन के आकांक्षी हैं। पिछले करीब साढ़े छह दशक में इन्हें जमीन मुहैया कराने का लक्ष्य तो पूरा नहीं हो सका, हां, इनकी जमीन हड़पने और इन्हें किसान से मजदूर बना डालने की तरकीबें जरूर कामयाब हुईं।

हाल के दशकों में हमारी आर्थिक मजबूती की जो जगमगाती तसवीर देश-दुनिया में दिखाई गई है, उसमें ये भूमिहीन कहीं नहीं हैं। हमारे नीति-नियंताओं ने कदाचित मान लिया है कि किसानों की जमीन उद्योग घरानों के लिए छीनकर ही आर्थिक विकास संभव है। इसलिए विकास की कीमत चुकाते ये लोग अपना हक मांगने जब राजधानी की ओर कूच करते हैं, तो संवेदना जताने के बजाय सत्ता-व्यवस्था की सारी कोशिश इन विक्षुब्धों को वापस भेजने की होती है। करीब साढ़े तीन साल पहले भी ये लोग अपना हक मांगने राजधानी आए थे। तब इनकी समस्याओं के हल के लिए आनन-फानन में सरकार ने नेशनल काउंसिल फॉर लैंड रिफॉर्म्स का गठन किया था, जिसके मुखिया प्रधानमंत्री बनाए गए थे।

अब जब ये भूमिहीन दोबारा दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक देने पहुंच रहे हैं, तब पता चलता है कि इस दौरान इस परिषद् की एक बैठक तक नहीं हुई, समाधान की तो बात ही छोड़ दें! इससे यह भी साफ होता है कि उदार अर्थनीति को रामबाण समझने वाली सरकार के एजेंडे में भूमिहीनों की बेहतरी की कोई रूपरेखा है ही नहीं। ऐसा भी नहीं है कि भूमिहीनों के प्रति यह रवैया केवल कांग्रेस  ही है। यूपीए की आर्थिक नीतियों का विरोध करने वाली उन पार्टियों में भी इन भूमिहीनों के प्रति संवेदना का भाव नहीं दिख रहा, जो इस चुनावी बेला में आम जनों की बेहतरी की बात करते हुए गला फाड़ रही हैं।

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