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पूर्वजों की कला को बरकार रखने में जुटी तीसरी पीढ़ी

Wed, 17 Sep 2014 01:13 AM IST
ब्यूरा/अमर उजाला/ यमुनानगर।
ब्यूरा/अमर उजाला/ यमुनानगर। Updated Wed, 17 Sep 2014 01:13 AM IST
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The third generation of ancestors engaged in art keep you going
कला किसी पहचान की मोहताज नहीं, किंतु आधुनिका की चकाचौंध में उसे कायम रखना मुश्किल है। आर्थिक लाभ के फेर में लोग पुश्तैनी कार्यों को छोड़ रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी हाथ के हुनर का हस्तांतरण खत्म होने से कलाओं का अस्तित्व भी खोने को है।
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लेकिन छोटा मॉडल टाउन का मनचंदा परिवार विरासत में मिली कला को कायम रखने की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है। पूर्वजों से मिली पुतले बनाने की कला को तीसरी पीढ़ी न केवल जिंदा रखे हुए है, बल्कि उनकी ख्वाहिश अगली पीढ़ी को भी यह कला सौंपने की है।
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परिवार के महेंद्र मनचंदा, उनके बेटे पंकज मनचंदा और भाई नरेश कुमार इस बार करीब तीन लाख की लागत से 70 फुट दशानन और 55-55 फुट मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतले तैयार कर रहे हैं। तीन अक्तूबर को विजयदशमी पर दशहरा ग्राउंड में तीनों पुतलों का दहन होगा।
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गौरतलब है कि दशहरा पर दहन के लिए रावण, कुंभकरण व मेघनाद के पुतलों के विशाल रूप, आकार और उत्साह का जब कहीं जिक्र होता है, तो यमुनानगर का नाम अग्रणी होता है। परिवार के पूर्वज पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में इन पुतलों के बनाने का कार्य करते थे। परिवार के कारीगर महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि 34 वर्षों रावण का पुतला बनाते आ रहे हैं।

उनके चाचा विश्वनाथ पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में पुतले बनाने का ही कार्य करते थे। उनको यह विद्या विरासत में मिली। अब वे स्वयं, उनके बेटे पंकज मनचंदा और भाई नरेश कुमार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह उनकी तीसरी पीढ़ी है, जो लगातार विजयदशमी के अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाती आ रही है।


महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि वर्ष-2006 में विजयदशमी पर विदेशी पर्यटक भी उनकी इस कलाकृति को देखने के लिए आए थे। तब विदेशी पर्यटकों ने उनकी कला को सराहा और पुतलाें को बनाने की विधि को जाना। आज भी उनको हर वर्ष आसपास के जिलों से सहित दूसरे प्रदेशाें से भी पुतले बनाने की पेशकश आती है, लेकिन वे भारी-भरकम पेशकश से समझौता कभी नहीं करेंगे। उनकी केवल यही ख्वाहिश है कि इस कला को जीवित रख अगली पीढ़ी को इसे सुरक्षित सौंप दिया जाए।
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