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दृढ़ता का सुबूत
नई दिल्ली
Updated Wed, 10 Jun 2015 08:28 PM IST
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मणिपुर में छह डोगरा रेजीमेंट के जवानों पर हुए हमले के एक हफ्ते के भीतर ही भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर दो उग्रवादी शिविरों को ध्वस्त कर बड़ी सफलता हासिल की है। इस कार्रवाई को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका को अहम बताया जा रहा है। इससे पता चलता है कि भविष्य में ऐसे किसी भी हमले की स्थिति में नई दिल्ली की प्रतिक्रिया किस तरह की हो सकती है।
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इस कार्रवाई के बाद सीमा पार से आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले पाकिस्तान से जिस तरह की तीखी प्रतिक्रिया आई है, उससे समझा जा सकता है कि वहां कैसी बेचैनी है। हालांकि यह भी सच है कि म्यांमार और बांग्लादेश से सटे पूर्वोत्तर और पाकिस्तान से सटी सीमा की परिस्थितियां भिन्न हैं। पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर की आड़ में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता आया है।
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भारत के लिए पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सीमा पार आतंकवाद सबसे बड़ा मसला है। वहीं म्यांमार के साथ भारत का रिश्ता अब न केवल सहज है, बल्कि यह कार्रवाई तो उसे विश्वास में लेकर ही की गई है। जाहिर है, पाकिस्तान की सीमा में घुसकर ऐसी कार्रवाई की बातें जोश तो पैदा कर सकती हैं, पर व्यावहारिक नहीं हैं।
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यह विडंबना ही है कि आतंकवाद से पीड़ित होने के बावजूद पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देता है। इसके उलट पूर्वोत्तर से सटे भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे देशों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई में भारत की मदद ही की है।
इस क्रम में यह देखने की भी जरूरत है कि आखिर एनएससीएन (खापलांग) नए सिरे से कैसे सक्रिय हो गया? वास्तव में केंद्र सरकार इस गुट को वैसी तवज्जो नहीं देती, जैसा उसने करीब दो दशकों से एनएससीएन (इसाक-मुइवा) को दिया है। बल्कि इस वर्ष की शुरुआत में तो खापलांग गुट के साथ समझौता भी खत्म हो गया, दूसरी ओर इस गुट के नेता ने नौ अलगाववादी गुटों का नया संगठन बना लिया, लिहाजा और हमले की आशंका खत्म नहीं हुई है। साथ ही यह भी समझने की जरूरत है कि अलगाववाद या उग्रवाद की समस्या से सिर्फ सैन्य कार्रवाई से नहीं निपटा जा सकता; राजनीतिक समाधान के बिना इससे स्थायी तौर पर निजात नहीं मिल सकती।