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ईमानदारी की कीमत

Thu, 19 Mar 2015 08:01 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 19 Mar 2015 08:01 PM IST
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The price of honesty

कर्नाटक के युवा आईएएस अधिकारी डी के रविकुमार की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने ईमानदार अधिकारियों की चुनौतियों को फिर से सामने ला दिया है। कर्नाटक सरकार और राज्य पुलिस उनकी मौत को आत्महत्या बता रही है, पर उनके परिजनों को उनकी मौत के पीछे गहरी साजिश लग रही है। यहां तक कि आईएएस अधिकारियों का एक वर्ग भी उनकी मौत को आत्महत्या मानने से इन्कार कर रहा है।

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जाहिर है, बिना निष्पक्ष जांच के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता, मगर इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि रविकुमार चुनौतियों से सीधे टकराने वाले शख्स थे। बंगलूरू में एडिशनल कमिश्नर, टैक्स के पद पर नियुक्ति से पहले कोलार के डिप्टी कमिश्नर के रूप में उन्होंने रियल इस्टेट माफिया की रीढ़ तोड़ दी थी। बिल्डरों और राजनेताओं के मजबूत गठजोड़ से टकराने से उन्होंने गुरेज नहीं किया था।
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यदि यह तथ्य सही है कि जिन भ्रष्ट बिल्डरों को उन्होंने चुनौती दी थी, उनकी कंपनियों में राज्य की सिद्धारमैया सरकार के भी कुछ मंत्रियों की हिस्सेदारी है, तो इसकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? यही नहीं, बंगलूरू में पदस्थ होने के बाद उन्होंने रसूखदार बिल्डरों और ज्वेलरों से बकाया करों की वसूली के लिए अभियान तो चलाया ही, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की थी।
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हम जिस व्यवस्था में रह रहे हैं, उसमें ऐसे गठजोड़ों से टकराने वाले अधिकारियों के सामने किस तरह की चुनौतियां आती हैं, यह छिपा नहीं है। बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में भ्रष्टाचार उजागर कर जान गंवाने वाले सत्येंद्र दुबे से लेकर, रेत माफिया से टकराने वाली दुर्गा नागपाल और हरियाणा में जमीन घोटाला उजागर करने वाले अशोक खेमका तक कई नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्हें भ्रष्ट व्यवस्था से टकराने की कीमत चुकानी पड़ी है।


एक मामूली किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले रविकुमार की मौत का मामला संसद में भी उठ चुका है और केंद्र सरकार तक इसकी सीबीआई जांच के लिए तैयार है। अच्छा होता कि राज्य सरकार इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए, वर्ना यही संदेश जाएगा कि वह किसी को बचाना चाहती है। रविकुमार की मौत का सच सामने लाने के साथ ही यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत है कि ईमानदार अधिकारी निर्भीकता से अपना काम कर सकें।

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