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संबंधों का नया सेतु

Thu, 07 May 2015 07:33 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 07 May 2015 07:33 PM IST
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The new bridge of relation

भारत और बांग्लादेश के बीच चार दशक से भी लंबे समय से अटके भू-सीमा समझौते (एलबीए) पर राज्यसभा में सर्वसम्मति से मुहर लगाकर सत्तारूढ़ एनडीए के साथ ही विपक्षी दलों ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। खासकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की तारीफ की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना हिचक के स्वीकार किया कि वह उसी पहल को आगे बढ़ा रही हैं, जिसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय हुई थी। तीखे कटाक्ष और लगभग संवादहीनता जैसे हालात पैदा कर देने वाली राजनीति के दौर में सदन में ऐसी सौजन्यता अमूमन नहीं दिखती।

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हालांकि यह भी सच है कि यह समझौता अपने आप में मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है, जिससे भारत और बांग्लादेश के उन पचास हजार से अधिक लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है, जिन्हें दशकों से नागरिक होने के अपने सांविधानिक अधिकार से वंचित होना पड़ा है। दोनों देशों की ऐसी कुल 162 बस्तियों की अदला-बदली का मामला मई, 1974 से अटका हुआ था। इनमें से 111 भारत के हिस्से की हैं और 51 बांग्लादेश के।
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ये बस्तियां एक-दूसरे देश की सीमा से इस तरह घिरी हुई हैं कि वहां सामान्य नागरिक प्रशासन तक नहीं पहुंच पाता और शिक्षा, अस्पताल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक वहां उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच ऐसे भूभाग भी हैं, जिनका सीमांकन नहीं होने से अलगाववादियों, उपद्रवियों और तस्करों के साथ ही नागरिकों की अवैध आवाजाही रोकी नहीं जा सकी है।
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यों तो इस समझौते से असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय की सीमाएं प्रभावित होंगी, लेकिन असम को लेकर तब विवाद पैदा हो गया था, जब सरकार ने संशोधन विधेयक से उसका नाम हटा दिया था। इससे पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के भी पीछे हटने की आशंका पैदा हो गई थी, मगर बाद में यह विधेयक न केवल अपने मूल रूप में पेश किया गया, बल्कि केंद्र सरकार ने समझौते से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए पश्चिम बंगाल को 3,000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने का ऐलान भी किया है।


बेशक, इसके पीछे राजनीति भी हो सकती है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं। मगर यह भी सच है कि यह समझौता भारत-बांग्लादेश संबंधों को एक नया मोड़ दे सकता है।

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