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कलाकार का घर

Fri, 25 Oct 2013 07:36 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 25 Oct 2013 07:36 PM IST
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the home of artist

मन्ना डे ने अपने जीवन के लगभग पचपन साल मुंबई में बिताए, और पिछले करीब दस साल से वह बंगलूरू में थे। उन्होंने जो जीवन चुना, वह क्षेत्र और भाषा की संकुचित पहचान से ऊपर था। कोलकाता में वह पैदा हुए, मुंबई ने उन्हें रोजगार और पहचान दी, तो अपने जीवन का राग मधुवंती उन्होंने बंगलूरू में सुना।

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उनके गाए गीत भी किसी एक भाषा की चौहद्दी में सीमित नहीं हैं। उनके गानों में निरंतर चलते रहने और एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जाने के जो रूपक आए, उसकी प्रतिच्छवि ही उनके चलायमान जीवन में दिखने को मिली। इसलिए निधन के बाद उनकी अंत्येष्टि को लेकर उठा विवाद और पश्चिम बंगाल सरकार का असंतोष थोड़ा चौंकाता है।
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इसमें कोई शक नहीं कि मन्ना डे बंगाल के बेटे थे। हिंदी फिल्म संगीत को उन्होंने जितना समृद्ध किया, बांग्ला फिल्म संगीत और आधुनिक बांग्ला गान में उनका योगदान उससे जरा भी कम नहीं माना जाएगा। हेमंत मुखोपाध्याय के बाद मन्ना डे ही वह दूसरे गायक थे, जिसकी बंगाल में लोकप्रियता सीमा से परे थी।
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इस अर्थ में पश्चिम बंगाल के कलाप्रेमियों का अफसोस बेशक समझा जा सकता है कि उन्हें मन्ना डे की अंतिम यात्रा में श्रद्धा सुमन अर्पित करने का सुयोग नहीं मिला। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि कलाकार का व्यक्तिगत जीवन उसकी विरासत की तरह सार्वजनिक नहीं होता। लिहाजा बंगलूरू में ही अंतिम संस्कार कर देने के उनके परिवार के फैसले का हमें सम्मान करना चाहिए।

खुद मन्ना डे ने बहुत सोच-समझकर बंगलूरू को अपने जीवन के आखिरी ठिकाने के रूप में चुना था। पिछले साल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें बंगविभूषण सम्मान भी वहीं जाकर दिया था। पत्नी की मृत्यु के बाद अकेले पड़ चुके मन्ना डे की इच्छा यही थी कि उनका अंतिम संस्कार बंगलूरू में हो। ऐसे में विवाद पैदा करने का सवाल ही कहां पैदा होता है!

विगत कुछ वर्षों से हमारे देश में क्षेत्रवाद और प्रतीकों की राजनीति का चलन जिस तरह बढ़ा है, उसमें पश्चिम बंगाल सरकार का मौजूदा रवैया आश्चर्यजनक भले नहीं है, पर खीझ जरूर पैदा करता है।


क्या विद्रूप है, जो सरकार तसलीमा नसरीन जैसी बेघर साहित्यकार को शरण देने का साहस नहीं जुटा पाई, वह स्वेच्छा से बाहर बसे एक कलाकार की अंत्येष्टि अपने राज्य में करने की जिद सिर्फ इसीलिए करती है, ताकि उसे अपने राजनीतिक हित में भुना सके!

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