{"_id":"9cb4e56cdf81f92a7b30615a8e8974ac","slug":"the-future-of-afghanistan-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"अफगानिस्तान का भविष्य","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
अफगानिस्तान का भविष्य
नई दिल्ली
Updated Mon, 22 Sep 2014 07:50 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अफगानिस्तान में पिछले कई महीने से जारी राजनीतिक गतिरोध के बाद आखिरकार राष्ट्रपति हामिद करजई का उत्तराधिकारी मिल गया है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि नए राष्ट्रपति अशरफ गनी और मुख्य कार्यकारी का पद स्वीकार करने वाले अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच हुआ समझौता कितना कारगर होगा, क्योंकि दोनों ही चुनाव में एक दूसरे पर धांधली का आरोप लगा रहे थे।
विज्ञापन
अब नई सरकार के साथ ही अफगानिस्तान का भविष्य काफी कुछ इन्हीं दोनों नेताओं पर निर्भर होगा। दोनों ने सार्वजनिक रूप से एक दूसरे से गले मिलकर यह जतलाने की कोशिश जरूर की है कि वे अमेरिका की पहल पर हुए समझौते से संतुष्ट हैं। मगर भूलना नहीं चाहिए कि अभी न तो इस समझौते के पूरे ब्योरे बाहर आए हैं और न ही चुनाव आयोग ने विस्तृत चुनाव नतीजे घोषित किए हैं!
विज्ञापन
इसके अलावा यह नई व्यवस्था हामिद करजई की सरकार के समय से चली आ रही व्यवस्था से अलग होगी, क्योंकि इसमें मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद सृजित किया गया है, जिसे प्रधानमंत्री पद जैसा माना जा रहा है। इससे सत्ता के दो केंद्र बनने और उनमें आपस में टकराव होने की भी आशंका है। लाख टके का सवाल है कि क्या नई सरकार अफगान लोगों की आकांक्षाओं पर खरा उतर सकेगी?
विज्ञापन
हकीकत यह है कि हामिद करजई भले ही एक दशक से भी लंबे समय से सत्ता में हैं, लेकिन काबुल से बाहर उनका नियंत्रण न के बराबर था। इसके अलावा उनके शासन में भ्रष्टाचार भी फला-फूला और बेरोजगारी भी बढ़ती गई। अमेरिकी और नाटो सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर अमेरिका के साथ उनकी तल्खी भी बढ़ती गई है। हालत यहां तक हो गई कि अमेरिका पिछले दरवाजे से तालिबान तक से बात करने को तैयार हो गया! वास्तव में अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार भले चल रही है, पर तालिबान ने भी इन वर्षों में फिर से खुद को मजबूत किया है। और जब अमेरिकी फौज वहां से लौट जाएगी, तब तालिबान के और मजबूत होने की आशंका है।
वहीं दूसरी ओर अफगान लोगों ने जून में हुए चुनावों में तालिबान के बहिष्कार की धमकियों को दरकिनार कर यही जतलाया है कि उनका यकीन लोकतंत्र में है। गनी पख्तून हैं और अब्दुल्ला ताजिक, ऐसे में जरूरी है कि दोनों नेता बेहतर तालमेल के साथ सभी वर्ग का ख्याल रखें, इसी में अफगानिस्तान का भविष्य निहित है।