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कथनी और करनी में फर्क
नई दिल्ली
Updated Mon, 13 Jul 2015 08:36 PM IST
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पाकिस्तान ने मुंबई बमकांड के मुख्य साजिशकर्ता और भारत में वांछित आतंकी जकीउर रहमान लखवी के मुद्दे पर जिस तरह से रुख बदला है, वह आतंकवाद के मुद्दे पर उसके दोहरे रवैये को ही रेखांकित करता है। रूसी शहर उफा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई बातचीत के बाद जारी साझा बयान में दोनों नेताओं ने न केवल आतंकवाद के सभी रूपों की आलोचना की थी, बल्कि शांति और स्थिरता कायम करने के लिए इससे निपटने की साझा जिम्मेदारी भी स्वीकार की थी।
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यही नहीं, दोनों पक्षों ने मुंबई कांड की सुनवाई तेज करने के साथ ही आरोपियों के वॉयस सैंपल देने पर भी सहमति जताई थी। लेकिन महज तीन दिन के बाद ही पाकिस्तान की ओर से जो बयानबाजी हो रही है, उससे उसकी कथनी और करनी का फर्क साफ देखा जा सकता है। उसका यह तर्क हास्यास्पद है कि चूंकि उनके यहां किसी आरोपी के 'वॉयस सैंपल' लेने से संबंधित कानून नहीं हैं, इसलिए वह लखवी का 'वॉयस सैंपल' नहीं ले सकता।
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सवाल इस सैंपल का नहीं, 26/11 के बम हमलों के बाद पिछले छह-सात वर्षों में भारत ने पाकिस्तान को इस बमकांड से संबंधित पर्याप्त सुबूत दिए हैं, इसके बावजूद उसने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। बची-खुची कसर पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने यह कहकर पूरी कर दी है कि उनका मुल्क भारत से तब तक बात नहीं करेगा, जब तक कि एजेंडे में कश्मीर का मुद्दा शामिल न हो!
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यह अकारण नहीं है कि ठीक इसी समय पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा ईद के बहाने कश्मीरी अलगाववादियों को आमंत्रित किए जाने की खबर भी आई है। इससे पहले पिछले वर्ष दोनों देशों के विदेश सचिवों की प्रस्तावित बातचीत से ऐन पहले भी पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं को आमंत्रित कर भड़काने वाला काम किया था। कश्मीर को जबर्दस्ती मुद्दा बनाने की कोशिश पाकिस्तान के सत्ता तंत्र की अंदरूनी मजबूरी भले हो सकती है, लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदलने वाली है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि यह उसके हक में भी है कि उफा में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच बनी सहमति सिर्फ कागजों में सिमट कर ही न रह जाए।