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अनिर्णय का अंधेरा
कुलदीप तलवार
Updated Fri, 13 Jun 2014 08:29 PM IST
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जिस समय उत्तर भारत भीषण बिजली संकट से दो-चार है, तब यह सूचना बेहद चौंकाने वाली है कि देश के अधिकतर थर्मल पावर प्लांट कोयले की कमी से जूझ रहे हैं। एक आंकड़ा बताता है कि सौ में से अड़तीस पावर प्लांटों में एक सप्ताह का, तो बीस पावर प्लांटों में चार दिन का कोयला बचा है! ऐसे में, बदतर आशंकाएं ही पैदा होती हैं।
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30 जुलाई, 2012 की वह स्मृति अभी ताजा है, जब ग्रिड फेल होने से आधे देश में अंधेरा छा गया था। हालांकि केंद्रीय विद्युत नियामक प्राधिकरण का कहना है कि इन इकाइयों में सात दिन तक का स्टॉक रखे जाने का ही प्रावधान है। बिजली मंत्री पीयूष गोयल भी आश्वस्त कर रहे हैं कि किसी पावर प्लांट में उत्पादन ठप नहीं होगा। लेकिन जब बिजली की मांग चरम पर है, तब कोयले की भारी कमी की अनदेखी नहीं कर सकते। तब तो और नहीं, जब मानसून कमजोर रहने पर जलविद्युत उत्पादन घटेगा।
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चिंताजनक बात यह है कि विद्युत इकाइयों में कोयले की यह कमी कोई फौरी समस्या नहीं, बल्कि वर्षों-दशकों की काहिली, अदूरदर्शिता और नीतिगत अनिर्णय का नतीजा है। यह कम बड़ा विद्रूप नहीं है कि कोयला उत्पादन में अग्रणी यह देश बिजली उत्पादन के लिए कोयला आयात करता है। जब हमारे यहां कोयले का भंडार है, तो विद्युत उत्पादक इकाइयों तक वह पहुंचता क्यों नहीं? वह इसलिए कि रेल पटरियों पर सवारी गाड़ियों का जितना महत्व है, उतना माल ढोने वाली गाड़ियों का नहीं।
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खदानों से कारखानों तक तेजी से कोयला पहुंचाने के लिए एक दशक पहले खास रेल पटरियों की योजना बनी थी, जिन पर अभी तक काम ही शुरू नहीं हो पाया है! भारत जैसे देश में इस तरह की निष्क्रियता अक्षम्य है, जहां पर्यावरण और स्थानीय प्रतिरोधों के चलते खनन उद्योग पर पहले से ही संकट है।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक देशवासियों को चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन मौजूदा स्थिति में यह कैसे संभव होगा! चौबीसों घंटे बिजली की उपलब्धता के लिए उत्पादन बढ़ाने से लेकर बिजली चोरी पर अंकुश लगाने, राज्य बिजली बोर्डों का घाटा पाटने, लागत के अनुरूप मूल्य तय करने से लेकर मुफ्त बिजली की सौगात बांटना बंद करने जैसे तमाम कदम उठाने पड़ेंगे।