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तेलंगाना और सीमांध्र
नई दिल्ली
Updated Mon, 02 Jun 2014 08:16 PM IST
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भौगोलिक विभाजन से कहीं अधिक त्रासद भावनात्मक अलगाव होता है। देश के उनतीसवें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्से सीमांध्र, दोनों की यह जिम्मेदारी है कि अब जबकि ये दोनों नई शुरुआत कर रहे हैं, तो अतीत की कड़वाहट उनकी राह में किसी तरह का रोड़ा न बने।
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मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदीभाषी राज्यों को छोड़ दें, जिनसे अलग होकर छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का निर्माण किया गया, तो एक ही भाषा वाले किसी राज्य का यह पहला विभाजन है। तेलंगाना और सीमांध्र, दोनों ही तेलुगू भाषी राज्य हैं और उनके बीच सिर्फ भाषा का ही साझा नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश की पूरी विरासत पर दोनों की समान हिस्सेदारी है।
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वास्तव में तेलंगाना और सीमांध्र, दोनों में ही विकास की काफी संभावनाएं हैं। पैंतालीस फीसदी वन क्षेत्र वाले तेलंगाना में देश का 20 फीसदी कोयला दबा हुआ है, तो लंबी तटीय सीमा वाले सीमांध्र में गैस का अकूत भंडार है। ऊर्जा के ये दोनों स्रोत न केवल इन दोनों राज्यों को गति दे सकते हैं, बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। अच्छी बात यह है कि आंध्र को एकजुट रखने के लिए हाल तक आंदोलन करते रहे वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी और तेलुगू देशम पार्टी के सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडु, दोनों ने तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने के चंद्रशेखर राव को बधाई दी है।
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मगर भूलना नहीं चाहिए कि सीमांध्र के मुख्यमंत्री बनने जा रहे चंद्रबाबू की तेलुगू देशम पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए का हिस्सा है। ऐसे में यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सीमांध्र के साथ ही तेलंगाना का भी पूरा ख्याल रखे। मसलन, सीमांध्र में गोदावरी नदी पर बन रही महत्वाकांक्षी पोलावरम परियोजना को लेकर अभी खम्मम जिले के तकरीबन ढाई सौ गांवों को सीमांध्र में जोड़ने से जो अप्रिय स्थिति बनी है, वह समय रहते केंद्र के हस्तक्षेप से टाली जा सकती है।
बेशक, सीमांध्र के लिए अगस्त तक नई राजधानी की तलाश हो जाएगी, लेकिन चूंकि अगले एक दशक तक हैदराबाद दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी बना रहेगा, तो यह भी जरूरी है कि इसे लेकर अब कोई टकराव न हो। ये दोनों राज्य चाहें, तो आपसी सहमति और सह-अस्तित्व की मिसाल बन सकते हैं।