तस्वीर बदलेगा तेजस
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देश में निर्मित छोटे और हल्के लड़ाकू विमान, तेजस, की पहली खेप वायुसेना को मिलने में हालांकि बहुत अधिक समय लग गया, लेकिन बत्तीस साल पुराना सपना आखिरकार साकार हुआ है, तो इसका श्रेय निस्संदेह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और तेजस को बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को जाता है। तेजस की खासियत है कि यह नए जमाने का युद्धक विमान है; बेहद हल्का होने के साथ-साथ इसका इंजन ज्यादा ताकतवर है, और हथियार लाने-ले जाने तथा उड़ान भरने के मामले में यह अपने पूर्ववर्ती रूस के मिग-21 से बेहतर बताया जा रहा है, जो पिछले करीब एक-डेढ़ दशक में उड़नताबूत ही साबित हुआ था।
यह महज संयोग ही है कि यह स्वदेशी उपलब्धि ठीक तब हासिल हुई है, जब रक्षा मामले में पुराने दोस्त रूस से हमारे रिश्ते पहले जैसे नहीं रह गए हैं, और हमें रक्षा उपकरण मुहैया कराने में यूरोप और अमेरिका की भागीदारी बढ़ गई है। हालांकि अभी तेजस को दूसरे चरण की ही मंजूरी मिली है, लिहाजा इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक जंगी उपकरण नहीं हैं, और न ही अभी यह हवा में ईंधन भरने और लंबी दूरी तक मिसाइल दागने की क्षमता से लैस है।
पर यह बहुत चिंता की बात इसलिए नहीं, क्योंकि लगभग इस साल के अंत तक अंतिम मंजूरी मिलने तक तेजस इन सभी क्षमताओं से पूर्ण हो चुकेगा। तेजस का हमारी वायुसेना का हिस्सा बनना सिर्फ इसलिए ऐतिहासिक नहीं है कि यह हमारा पहला स्वदेशी युद्धक विमान है, बल्कि इसका महत्व इसलिए भी है कि यह आने वाले दिनों में युद्धक विमानों के मोर्चे पर हमारी विदेशी निर्भरता खत्म कर सकता है। विदेशों से रक्षा सौदे न सिर्फ बेहद संवेदनशील और आपसी संबंधों को प्रभावित करने की हद तक होते हैं, बल्कि वे अपेक्षाकृत महंगा सौदा भी साबित होते हैं।
हालांकि अपनी सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती के लिए अत्याधुनिक विदेशी उपकरणों की खरीद से बचा भी नहीं जा सकता, पर जो देश महाशक्ति बनने की राह पर है, और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक से निर्मित मंगलयान जिसकी विराट उपलब्धि है, वह अगर ठान ले, तो रक्षा मोर्चे पर विदेशी निर्भरता को यथासंभव कम कर ही सकता है। तेजस भारत की सिर्फ तस्वीर ही नहीं बदलेगा, बल्कि यह रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को गति मिलने का भी कारण बनेगा।