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टीम इंडिया की जीत
नई दिल्ली
Updated Mon, 24 Jun 2013 08:45 PM IST
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बर्मिंघम में चैंपियंस ट्रॉफी में भारतीय टीम ने जिस तरह के खेल का प्रदर्शन किया और फाइनल में इंग्लैंड की अनुशासित टीम को पराजित कर कप पर कब्जा जमाया, उससे देश के क्रिकेटप्रेमियों का उत्साहित होना स्वाभाविक है।
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दरअसल आईपीएल के छठे संस्करण में स्पॉट फिक्सिंग से उठे विवाद के कारण क्रिकेट की विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा है। खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष श्रीनिवासन तक पर इसकी आंच आई है, ऐसे में देश के युवा क्रिकेटरों ने इस खेल को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है।
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सचिन, सहवाग, युवराज सिंह और गौतम गंभीर के बिना मैदान में उतरी इस युवा टीम की जीत के बाद अब कहा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट में एक नया युग शुरू हो चुका है। इस बदलाव में विराट कोहली, शिखर धवन, रवींद्र जडेजा, रोहित शर्मा और आर अश्विन भारतीय क्रिकेट का नया चेहरा बनकर उभरे हैं और यह टीम अब पुराने दिग्गजों की कमी को पूरा करती दिख रही है।
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यह बात रेखांकित की जानी चाहिए कि फिक्सिंग और हितों के टकराव के तमाम आरोपों के बावजूद धोनी ने जता दिया है कि उनके लिए क्रिकेट ही सर्वोपरि है। आखिर उनकी अगुआई में भारतीय टीम ने आईसीसी द्वारा आयोजित की जाने वाली तीनों बड़ी स्पर्धाएं जीती हैं और टीम इंडिया को एक बार टेस्ट रैंकिंग में वह नंबर वन के शिखर तक भी पहुंचा चुके हैं। चैंपियंस ट्रॉफी के बहाने देखा जा सकता है कि आईपीएल विवाद के बावजूद निवेशक क्रिकेट में पैसा लगा रहे हैं।
इसी दबाव का नतीजा है कि आईसीसी को चैंपियंस ट्रॉफी के वनडे वाले फॉर्मेट को खत्म करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। असल में चार शीर्ष टेस्ट टीमों के बीच चैंपियंस ट्रॉफी कराने का भी प्रस्ताव है, उसमें सबसे बड़ा जोखिम यही है कि भारतीय टीम हमेशा शीर्ष चार में नहीं हो सकती और ऐसे में प्रसारकों की इसमें दिलचस्पी कम हो सकती है।
फटाफट क्रिकेट ने टेस्ट क्रिकेट को तो नुकसान पहुंचाया ही है, इसमें आए पैसे ने इस खेल के रंग-ढंग भी बदल दिए हैं। यह क्रिकेट के कर्ता-धर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वह खेल और पैसे में संतुलन बना कर चलें, ताकि क्रिकेट की गरिमा बरकरार रहे।