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जिम्मेदारी निभाने का समय
नई दिल्ली
Updated Mon, 21 Jan 2013 08:34 AM IST
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जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर की शुरुआत सोनिया गांधी द्वारा कुछ चुनौतियों के जिक्र से हुई थी, तो इसका समापन राहुल गांधी पर भरोसा जताए जाने से हुआ है।
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उन्हें उपाध्यक्ष बनाए जाने का बेशक व्यावहारिक अर्थ नहीं; यह तीसरा ही अवसर है, जब कांग्रेस में इस तरह का कोई पद सृजित किया गया है, लेकिन इसके प्रतीकात्मक अर्थ साफ हैं। बल्कि जयपुर में युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रतिनिधियों को पहली बार बुलाने के बाद तो संदेह ही नहीं रह गया था कि यह राहुल गांधी द्वारा उस बड़ी जिम्मेदारी को स्वीकारने का मंच बनेगा, जिसके प्रति वह पहले अनिच्छा जताते रहे हैं।
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अपने भाषण में राहुल गांधी ने कांग्रेस को बदलने की जुबानी प्रतिबद्धता जताई, तो पार्टी से जुड़े कई असहज सवाल उठाने का साहस भी दिखाया। जैसे कि उन्होंने चुनाव के समय टिकट बंटवारे में होने वाली गड़बड़ियों का जिक्र किया।
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पर सिर्फ यही नहीं कि उनकी देखरेख में हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेसी पराजय के पीछे टिकट वितरण में हुई अदूरदर्शिता जिम्मेदार थी, यह भी कि उनके होने के बावजूद कई प्रभावशाली राजनेताओं के रिश्तेदार संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं!
इसी तरह जिस पार्टी में ऊपर से मुख्यमंत्री थोपने की परंपरा बन चुकी है, उसमें कैसे यकीन किया जाए कि राज्य स्तर पर अधिक से अधिक नेता तैयार किए जाएंगे! कांग्रेस की वंशवादी राजनीति के बारे में कहा जाता है कि चापलूस ही सही फैसला नहीं लेने देते।
ऐसे में यह सोचना कि राहुल गांधी अब वाकई चीजों को सही शक्ल देंगे, उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीद पाल लेना होगा। कम से कम दो और वजहों से इस शिविर ने हताश किया। एक तो इसमें सोनिया और राहुल गांधी के सिवा किसी और पर फोकस नहीं था; प्रधानमंत्री भी नेपथ्य में ही दिखे।
दूसरे, इसमें कांग्रेस की प्रशंसा और आलोचना तो थी, लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और स्त्री सुरक्षा पर व्यापक विमर्श नहीं हुआ। जबकि आगामी चुनावों में पार्टी का पाला इन्हीं से पड़ेगा। राहुल गांधी को औपचारिक रूप से नंबर दो बनाकर कांग्रेस भले जश्न में डूब गई हो, पर चुनौतियों से जूझती पार्टी को जयपुर ने कोई राह दिखाई है, यह मानना कठिन है।