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मरीजों के हक में

Mon, 01 Apr 2013 09:17 PM IST
Updated Mon, 01 Apr 2013 09:17 PM IST
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supreme court rejects novartis cancer drug Glivec patent plea

जानलेवा कैंसर से निजात दिलाने वाली दवा ग्लाइवेक के पेटेंट से संबंधित याचिका को सर्वोच्च अदालत के खारिज करने से गरीब मरीजों को तो राहत मिलेगी ही, इस ऐतिहासिक फैसले का वैश्विक दवा कारोबार पर भी दूरगामी असर पड़ना तय है।

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इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि स्विट्जरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस को यदि ग्लाइवेक का पेटेंट दे दिया जाता, तो वह हमारे यहां मरीजों से हर महीने सवा लाख रुपये तक वसूलने को स्वतंत्र हो जाती, जबकि इसी फॉर्मूले की जेनेरिक दवाएं महज 10 हजार रुपये में बाजार में उपलब्ध हैं।
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असल में यह एक बड़ा खेल है, जिसे दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले से मौजूद दवाओं में मामूली फेरबदल कर या फिर उनका नाम बदलकर अंजाम देती हैं। जिस ग्लाइवेक के पेंटेट के लिए दावा किया जा रहा था, वह किसी नए फॉर्मूले से नहीं बनी है, बल्कि 15 वर्ष पूर्व बाजार में उतारी जा चुकी दवा का ही नया रूप है।
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इस दवा की मांग का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि नोवार्टिस दुनियाभर में चार अरब डॉलर की ग्लाइवेक दवा बेच डालती है। इस फैसले ने भारतीय पेटेंट कानून की भूमिका को भी रेखांकित किया है, जिसकी धारा 3 (डी) को अदालत में चुनौती दी गई थी।

इसके मुताबिक, उन्हीं दवाओं का पेटेंट किया जा सकता है, जो नई खोज या नए आविष्कार का नतीजा हों, पर इस कसौटी में ग्लाइवेक विफल साबित हुई। यह विडंबना ही है कि अपनी चालाकी को स्वीकार करने के बजाय कंपनी भारत के दवा क्षेत्र में निवेश को लेकर उलटी-सीधी बयानबाजी कर रही है।

कंपनी का यह कहना उसकी बौखलाहट को दर्शाता है कि भारत में बौद्धिक संपदा का अच्छा वातावरण नहीं है, जबकि सच इससे उलट है। असल में विकसित देशों के बाजार में मंदी के कारण बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की नजर भारत सहित विकासशील देशों पर टिकी है। साथ ही, भारत विकासशील देशों में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने वाला बड़ा जरिया है, जिसे पश्चिम की कंपनियां पचा नहीं पातीं।


सर्वोच्च अदालत के फैसले से स्थानीय दवा कंपनियों को तो संरक्षण मिलेगा ही, दूसरी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों पर भी इसका असर पड़ेगा, जिससे बहुत संभव है कि आने वाले समय में अन्य जीवन रक्षक दवाएं सस्ती कीमतों पर उपलब्ध हो सकेंगी।

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