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बीस साल बाद
Updated Thu, 21 Mar 2013 09:47 PM IST
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मार्च, 1993 में मुंबई में हुए शृंखलाबद्ध धमाकों से संबंधित मामले में आए सर्वोच्च अदालत के फैसले को सिर्फ संजय दत्त को सुनाई गई सजा के आलोक में व्यक्त की जा रही प्रतिक्रियाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह फैसला उस आतंकी हमले के खिलाफ है, जिसने न केवल देश को भीतर से झकझोर दिया था, बल्कि उसके बाद आतंकवाद देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया, जिससे हम आज तक जूझ रहे हैं।
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इस हमले को जिस तरह अंजाम दिया गया था, उससे पता चलता है कि आतंकियों ने हमारी व्यवस्था की खामियों का भी फायदा उठाया, वरना ऐसा कैसे हो सकता था कि पुलिस और कस्टम की नजरों से बचकर बारूद और हथियारों की आवाजाही हो पाती। यह कितना सुनियोजित था, जिसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इन धमाकों से पहले ही दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन और उसके भाई तथा गुर्गे देश से बाहर जा चुके थे।
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इस फैसले ने एक बार फिर इस बात की पुष्टि की है कि पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने की साजिश करता आया है और उसकी जमीन से हमारे यहां आतंकी हमलों को अंजाम दिया जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने 1994 से जेल में बंद याकूब मेमन को सबसे अहम मानकर उसकी मौत की सजा बरकरार रखी है। मगर ध्यान रखने की बात यह है कि इस हमले के मुख्य षड्यंत्रकारी अब भी देश से बाहर हैं, और अबू सलेम जैसे आतंकी को पुर्तगाल से कुछ शर्तों के साथ ही यहां लाया जा सका था।
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मुंबई धमाकों सहित देश में हुए अनेक आतंकी हमलों को लेकर भारत कई बार दाऊद इब्राहिम सहित अनेक लोगों के बारे में पाकिस्तान को सुबूत दे चुका है, मगर हर बार इसे वह खारिज कर देता है। विशेष अभियोजक उज्ज्वल निकम का कहना है कि याकूब मेमन और अन्य दोषियों को सुनाई गई सजा से पाकिस्तान में पनाह लिए दाऊद और उसके साथियों पर भी दबाव बढ़ेगा। पर क्या वास्तव में ऐसा संभव है?
जहां तक संजय दत्त की बात है, तो सर्वोच्च अदालत ने उसके प्रति नरमी ही बरती है। उसे दी गई सजा से फिल्म जगत की चिंता के पीछे उनकी फिल्मों में फंसे करोड़ों रुपये हो सकते हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून की नजर में सब बराबर होते हैं।