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सूरज का चढ़ता पारा

Fri, 24 May 2013 09:31 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 24 May 2013 09:31 PM IST
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summer in north india

मई के इस व्यतीत होते महीने में सूरज का प्रकोप कुछ इस कदर बढ़ गया है कि समूचा उत्तर भारत त्राहि-त्राहि कर रहा है। दिन के शुरू होते ही सूरज सिर के ऊपर चढ़ आता है और देर रात तक उसकी मौजूदगी का तीखा एहसास बना रहता है।

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जिन बच्चों के स्कूलों की छुट्टियां हो चुकी हैं, उनकी तो मौज है, लेकिन बाकी लोगों के लिए लू के थपेड़ों के बीच चलना दुस्साहस की मांग करता है। मनुष्य की पहुंच से दूर जो छिटपुट जलस्रोत रह गए हैं, वे हांफते पशुओं के बसेरे बन गए हैं। जिन पेड़ों के नए पत्ते कुछ दिन पहले तक अपनी लाल आभा में चमकते थे, आज वे बुरी तरह झुलस गए हैं।
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राहत के तमाम कुएं सूख चुके हैं और तालाबों में इतना भी पानी नहीं बचा कि उसमें अपना प्रतिबिंब दिखे। पानी के लिए आसमान की ओर देखने का भी कोई मतलब नहीं है, क्योंकि मानसून में अभी विलंब है। बांदा, इलाहाबाद, अबोहर और श्रीगंगानगर की बात छोड़िए, रुद्रप्रयाग में पारा चालीस के पार जा चुका है!
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सूरज का यह कोप नया नहीं है। गर्मियां पहले भी पड़ती थीं। आंकड़े बताते हैं कि 1944 में उत्तर भारत में पारा सैंतालीस डिग्री के पार चला गया था। लेकिन तब न प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता इतना खराब था, और न ही हमने अपना जीवन इतना मशीनीकृत बनाया था।

भीषण गर्मियों में भी तब कुओं में पानी होता था और बाग-बगीचे सनसनाती गर्म हवा से बचने का सहारा बनते थे। लेकिन आज पहले जैसी वनस्पतियां नहीं हैं, तो गर्मी का प्रकोप स्वाभाविक ही मारक है। तिस पर प्रकृति के शोषण पर आधारित विकास के कारण जलस्रोत सूखने लगे हैं।

कभी सभ्यताएं नदी तटों पर बसती थीं, आज बड़े-बड़े टाउनशिप में पानी की अविरल आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। पानी के अभाव का आलम यह है कि गर्मी के इस मौसम में राष्ट्रीय राजधानी में जलापूर्ति टैंकर माफिया के भरोसे है, तो गंगा के किनारे बसे बनारस में भी पानी का घनघोर संकट है।


शहरी जीवन की त्रासदी यह है कि गर्मियों में अधिक मांग होने के कारण जब बिजली की कमी हो जाती है, तो पानी का भी अभाव हो जाता है। चूंकि विकास के साधनों का अधिक इस्तेमाल करने के कारण पृथ्वी उत्तरोत्तर गर्म हो रही है, ऐसे में सूरज का यह प्रकोप अस्वाभाविक नहीं है। जिस तरह का जीवन हमने चुना है, उसकी त्रासदी यह है कि गर्मी के हर मौसम में हम ऐसा कष्ट झेलते हैं, उसके बावजूद अपने रहन-सहन का ढर्रा बदलने के बारे में नहीं सोचते।

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