पोप बेनेडिक्ट की विरासत
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पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के कैथोलिक समाज के सर्वोच्च धार्मिक पद से हटने के फैसले ने एकबारगी वैटिकन में उपस्थित कॉर्डिनल्स को अचंभित भले किया हो, मगर दुनिया भर में उनके इस कदम को सम्मान के साथ ही देखा गया है। 19 अप्रैल, 2005 को जब उन्होंने पोप के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी, तभी वह न केवल 78 वर्ष के थे, बल्कि बीते तीन सौ वर्ष में सबसे बड़ी उम्र के पोप चुने जाने वाले पहले शख्स भी थे। और अब जब उन्होंने पोप की जिम्मेदारी से हटने का फैसला किया, तो 1415 में ग्रेगरी 12वें के बाद बीते छह सौ वर्षों में जीते-जी यह जिम्मेदारी छोड़ने वाले भी वह पहले पोप हैं।
असल में चर्च के विधान में ऐसे प्रावधान हैं, जिसमें कोई पोप देह त्यागे बिना भी पद से हट सकता है, बशर्ते कि यह फैसला बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रूप से लिया गया हो। उनके आधिकारिक बयान के बावजूद यह एक जग जाहिर तथ्य है कि जर्मनी में पैदा हुए धर्मशास्त्र के प्रोफेसर जोसेफ रात्जिंजर ने खुद ही स्वीकार किया है कि वह पोप नहीं बनना चाहते। उन्हें पोप का पद छोड़ने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने रूढ़िवादी दृष्टिकोण के लिए भी जाना जाएगा।
उन्होंने गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल के साथ ही कृत्रिम गर्भधारण का भी विरोध किया; और इस बीच गर्भपात की नैतिकता को लेकर भी बहस तेज हुई। मगर, सबसे विवादास्पद मामला पादरियों द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़ा था, जिसे लेकर मुकदमे तक हुए। सबसे दुखद यह है कि पोप के आलोचकों ने उन पर ऐसे मामलों की लीपापोती करने में सहभागी होने के आरोप भी लगाए।
हालांकि दूसरा पहलू यह भी है कि बेनेडिक्ट सोलहवें ने पीड़ितों से मुलाकात कर उनसे माफी मांगी और उच्च नैतिकता का प्रदर्शन किया। उन्होंने कैथोलिक चर्च की महत्ता और ईश्वर के निष्कपट प्रेम की शिक्षा दी है और धर्मनिरपेक्ष ईसाई समुदायों के बीच प्रार्थना के महत्व को प्रतिस्थापित किया।
बहरहाल, चर्च के सामने पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के उत्तराधिकारी चुनने की बड़ी चुनौती है। इसके लिए लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया से भले ही दावेदारी की बातें की जा रही हों, मगर यह हकीकत है कि कैथोलिक चर्च के दो हजार साल पुराने इतिहास में कोई गैर यूरोपीय पोप नहीं बना है!