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लीक से हटकर

Thu, 26 Dec 2013 08:25 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 26 Dec 2013 08:25 PM IST
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Success story of AAP

इसमें शक नहीं कि सत्ता राजनीति की कसौटी पर आम आदमी पार्टी का खरा उतरना बाकी है। फिलहाल तो आप के लिए दिल्ली में सरकार बनाने के बाद उसे कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर चलाना और मतदाताओं से किए गए वायदे पूरा करना ही बड़ी चुनौती होगा। मंत्री न बन पाने की जानकारी पर एक विधायक का असंतोष बताता है कि जनांदोलन के गर्भ से निकली इस पार्टी को आगे भी निष्ठा और लालसा के इस द्वंद्व से दो-चार होना पड़ सकता है।

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अभी तो भ्रष्टाचार के अलावा इसका दूर-दूर तक कोई एजेंडा भी नहीं दिखाई देता। इसके बावजूद दिल्ली में आप की सफलता पर स्थापित राजनीतिक पार्टियों में अगर खलबली और आम आदमी के बीच भरोसा है, तो इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। यह ठीक है कि इस तरह के प्रयोग अपने यहां तथा बाहर भी, बहुत असरदार नहीं हुए, पर इसका मतलब यह नहीं कि शुचिता और पारदर्शिता के लिए शुरू हुई लड़ाई को महत्व ही न दिया जाए।
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आप ने पानी और बिजली की उपलब्धता के बारे में जैसी चिंता जताई, लालबत्ती और सरकारी बंगले त्यागने की जो बात कही और भ्रष्टाचार को खत्म करने की जैसी प्रतिबद्धता दिखाई, उसने देश के व्यापक जनमानस को प्रभावित किया है। यही कारण है कि आप की जनता दरबार में आया एक रेहड़ी वाला पुलिस की हफ्तावसूली से छुटकारा दिलाने की मांग करता है, गुजरात के शिक्षित-प्रोफेशनल युवा आप से जुड़ने के लिए समूह में आवेदन करते हैं, तो पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की योजना के लिए केजरीवाल से मिलने आते हैं।
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बड़ी पार्टियों पर तो आप का असर साफ दिखता है। दागी राजनेताओं को बचाने वाला अध्यादेश फाड़कर और लोकपाल विधेयक पारित करवाकर कांग्रेस ने जताया है कि भ्रष्टाचार की अनदेखी महंगी पड़ेगी। इसी तरह मतदाताओं के घर-घर जाने की आप की रणनीति ने भाजपा को इतना आकर्षित किया है कि वह अभी से इस पर अमल की बात कर रही है। आप की उपलब्धि को देखकर ही सोशल मीडिया में सक्रियता बढ़ाने की जरूरत दोनों पार्टियां महसूस कर रही हैं। भ्रष्टाचार, वंशवाद और परिवारवाद के लिए कुख्यात समकालीन राजनीति में फिलहाल बदलाव की यह हवा भी कम बड़ी नहीं है।

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