फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Strong partnership

मजबूत होती साझेदारी

Tue, 27 Jan 2015 08:05 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 27 Jan 2015 08:05 PM IST
विज्ञापन
Strong partnership

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बहुचर्चित यात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी बढ़ती नजदीकी को तो रेखांकित किया ही है, दोनों देशों के बीच मजबूत होती साझेदारी भी इसमें देखी जा सकती है। वास्तव में पहली बार ऐसा लगा कि दोनों देशों के रिश्ते पाकिस्तान से निरपेक्ष होते जा रहे हैं, वरना अमेरिका अब तक भारत के साथ अपने रिश्ते को पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते से तौलता आया है।

विज्ञापन


असल में आतंकवाद से निपटने के मामले में अपनी बेबसी के बावजूद पाकिस्तान ने विश्वसनीयता खो दी है। इसी वजह से अमेरिका की नीति में पाकिस्तान को लेकर यह बड़ा परिवर्तन दिख रहा है। भारत-अमेरिका की इस नजदीकी का दक्षिण एशिया के साथ ही पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में भी प्रभाव पड़ सकता है। यह इससे जाहिर होता है कि पहली बार अमेरिका और भारत ने अपने साझा बयान में हिंद महासागर और एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत का उल्लेख किया है। इससे चीन की भवें तनना स्वाभाविक है। असल में यहीं भारत की बड़ी परीक्षा होगी कि कैसे वह चीन के साथ अपने संबंधों को अमेरिका से निरपेक्ष रखता है। वाकई इस क्षेत्र में समीकरण दिलचस्प होते जा रहे हैं, जहां चीन पाकिस्तान को अपना सदाबहार दोस्त बता रहा है!
विज्ञापन


मगर ओबामा की यात्रा का दूसरा पहलू दोनों देशों के परमाणविक और व्यापारिक संबंधों से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2008 से अटके असैन्य परमाणु समझौते में आया गतिरोध टूटा जरूर है, पर पेच अब भी हैं। मसलन, ओबामा ने अपनी कार्यकारी शक्तियों के जरिये संयंत्रों को निगरानी से मुक्त करने पर सहमति जताई है, लेकिन उनके इस कदम को अमेरिकी कांग्रेस किस तरह लेती है, यह देखना अभी बाकी है। इसी तरह परमाणु संयंत्रों में हादसे की स्थिति में मुआवजे की जिम्मेदारी से सप्लायर को मुक्त करने के कदम को भारत में संशय के साथ देखा जा रहा है। असल में इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


जहां तक द्विपक्षीय व्यापार की बात है, तो ओबामा ने इसे अगले कुछ वर्ष में सौ अरब डॉलर से पांच सौ अरब डॉलर पहुंचाने की बात की है, मगर सच यह भी है कि अमेरिका और चीन का द्विपक्षीय व्यापार अभी 560 अरब डॉलर से अधिक का है। कहने की जरूरत नहीं कि भारत-अमेरिका के बीच दोस्ती वाकई मजबूत हो रही है, लेकिन इसके नतीजों का अभी कुछ इंतजार करना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed