फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   strong message to sri lanka

श्रीलंका को सख्त संदेश

Thu, 21 Feb 2013 09:24 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 21 Feb 2013 09:24 PM IST
विज्ञापन
strong message to sri lanka

लंदन के चैनल 4 ने लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण के बेटे की मौत के जो ताजा वीडियो फुटेज जारी किए हैं, वे न सिर्फ श्रीलंकाई सेना और सरकार के इस झूठ से पर्दा हटाते हैं कि बालचंद्रन दोतरफा गोलीबारी के दौरान मारा गया था, बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाली इन तस्वीरों ने उस पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को भी सच साबित कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि उसे नजदीक से गोली मारी गई थी।

विज्ञापन


संयोग नहीं है कि अगले महीने जिनेवा में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकर परिषद की बैठक से ठीक पहले सामने आए इस खुलासे से श्रीलंका के खिलाफ वैश्विक घेरेबंदी तेज होने लगी है। यह सही है कि खुद लिट्टे ने कभी मानवाधिकार की परवाह नहीं की। पर एक चुनी हुई सरकार और उसकी सेना से हर कदम पर मानवाधिकार के पालन की उम्मीद की जाती है। सच तो यह है कि लिट्टे को खत्म करने की लड़ाई में श्रीलंकाई सेना ने बर्बरता की सारी सीमा लांघ डाली थी।
विज्ञापन


जिनेवा समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए उसने युद्धबंदी लिट्टे के लड़ाकों को तो मौत के घाट उतारा ही, बड़ी संख्या में निर्दोष तमिल नागरिकों को भी निशाना बनाया। यही नहीं, लिट्टे और तमिलों के खिलाफ इन ज्यादतियों को राजपक्षे सरकार ने जायज भी ठहराया।
विज्ञापन
विज्ञापन


श्रीलंका सरकार के खिलाफ आए बर्बरता के इस ताजा सुबूत ने तमिलनाडु की राजनीति को तो उद्वेलित कर ही दिया है, जहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक-दोनों राजपक्षे सरकार के खिलाफ सख्त अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, पश्चिमी देश भी चाहते हैं कि पिछले साल की तरह भारत इस बार भी श्रीलंका के खिलाफ आने वाले अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग करे।


मानवाधिकार के मामले में अफगानिस्तान और इराक में खुद अमेरिका का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, यह भी तथ्य है कि एशिया में चीनी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अमेरिका भारत को आगे कर रहा है, पर हम यह कैसे भूल सकते हैं कि श्रीलंका के तमिलों के हित हमसे जुड़े हुए हैं! बेशक हमारी सरकार को न गठबंधन राजनीति के दबाव में आना चाहिए, न अमेरिकी दबाव में, पर लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाली एक सरकार अगर कोलंबो की बर्बरता पर चुप्पी साध लेगी, तो इसका गलत संदेश ही जाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed